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शनिवार, 16 जून, 2007 को 10:57 GMT तक के समाचार
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पाकिस्तान में अनिश्चितता का शांति वार्ता पर असर

पाकिस्तान मे प्रदर्शन
निलंबित मुख्य न्यायाधीश इफ़्तिख़ार चौधरी के समर्थन में मानो जनता लामबंद होती जा रही है
पाकिस्तान के राष्ट्रपति जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ कहते हैं कि सबसे अच्छा शासक वह होता है जिससे जनता प्यार करती है न कि उससे डरती है या नफ़रत करती है.

आठ साल पहले नवाज़ शरीफ़ को हटाकर जब उन्होंने पाकिस्तान की बागडोर संभाली थी तो पाकिस्तान की सड़कों पर उन्हें जो समर्थन मिला था, वो देखने लायक था. पर आज़ उनके विरोध का जो नज़ारा है वो भी कम देखने लायक नहीं है.

पाकिस्तान के निलंबित मुख्य न्यायाधीश इफ़्तिख़ार चौधरी के समर्थन में मानो जनता लामबंद हो चली है और पहली बार जनरल मुशर्रफ़ के चेहरे पर गहरी चिंता की लकीरें नज़र आ रहीं हैं. आख़िर चिंता हो भी क्यों न. अब मुशर्रफ़ सरकार के सबसे मज़बूत सहयोगी - अमरीका में भी पाकिस्तान की स्थिती को लेकर सवाल उठने लगे हैं.

उधर पाकिस्तान के घटनाक्रम पर भारत की भी नज़रें टिकी हुई हैं. शांति प्रकिया पर जो ध्यान मुशर्रफ़ को देना चाहिए, क्या इस वक्त वो दे पा रहें होंगे और राजनीतिक अस्थिरता के इस माहौल में क्या भारत भी फूंक-फूंककर कदम उठाना चाहेगा? नवाज़ शरीफ़ सरकार में विदेश मंत्री रह चुके सरताज अज़ीज़ मानते है कि मुशर्रफ़ के सामने संकट गहरा गया है.

उनका कहना है, "ज़ाहिर है कि न्यायिक संकट की वज़ह से उनके दोबारा चुने जाने और वर्दी पहने रहने की योजना मुश्किल में पड़ सकती है क्योंकि न्याय प्रणाली की स्वतंत्रता पर संविधान के साथ छेड़छाड़ करना इतना आसान नहीं होगा. साथ ही उन पर ये भी दबाव है कि अगली बार उनका चुनाव मौजूदा असेंबली की जगह नई चुनी गई असेंबली बनने के बाद हो. इससे मुशर्रफ़ के ‘गेम प्लान’ में रुकावटें पड़ती नज़र आ रहीं हैं."

भारत की चिंता

मुशर्रफ़ की मुश्किलें
 उनके दोबारा चुने जाने और वर्दी पहने रहने की योजना मुश्किल में पड़ सकती है क्योंकि न्याय प्रणाली की स्वतंत्रता पर संविधान के साथ छेड़छाड़ करना इतना आसान नहीं होगा. साथ ही उन पर ये भी दबाव है कि अगली बार उनका चुनाव मौजूदा असेंबली की जगह नई चुनी गई असेंबली बनने के बाद हो
पूर्व विदेश मंत्री, सरताज़ अज़ीज़

वहीं भारत में इस बात को लेकर ऊहापोह है कि अगर वह मुशर्रफ़ प्रशासन से कोई समझौता करता भी है और यदि कल को वहाँ की राजनीतिक स्थिति बदल जाती है तो क्या वे उस समझौते को मानेगें?

पाकिस्तान में भारत के दूत रह चुके राजनयिक जी पार्थसारथी का मानना है, "पाकिस्तान के साथ संबंधों में ये समस्या हमेशा से रही है. ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो को बाहर करके जब जनरल ज़िया सत्ता में आए तो उन्होंने शिमला समझौते को अपनी मंज़ूरी नहीं दी. इसके बाद जब नवाज़ शरीफ़ की सरकार बनी तो वो भी चाहते थे कि शिमला समझौते को केंद्रीय या मुख्य समझौता समझौता न समझा जाए. ये चलता रहता है लेकिन कश्मीर जैसे मुद्दे पर फिलहाल कुछ ऐसे कदम उठाना जिस पर आम सहमति न हो, ये उचित नहीं होगा."

अभी हाल ही में भारत के एक टीवी चैनल को दिए एक साक्षात्कार में नवाज़ शरीफ़ ने कहा कि ‘कश्मीर जैसे अहम मुद्दे पर एक फ़ौजी शासक के साथ किए गए समझौते को कोई भी लोकतांत्रिक ताकत स्वीकार नहीं करेगी’.

अनिश्चितता का माहौल

क्या यह बयान भारत को पाकिस्तान से बातचीत के लिए फिर से सोचने पर मज़बूर करेगा, दक्षिण एशिया मामलों के जानकार प्रोफ़ेसर एसडी मुनि कहते हैं, "कुछ हद तक नवाज़ शरीफ़ राजनीतिक दिखावा कर रहें हैं और ऐसा करना उनके लिए जरुरी भी है. क्योंकि पाकिस्तान में जो घरेलू हालात बन रही है उसमें नवाज़ शरीफ मुशर्रफ़ पर दबाव डालने की कोशिश करेंगे और भारत को यह इशारा करेंगे की वो मुशर्रफ़ के साथ कोई समझौता नहीं करें ताकि मुशर्रफ़ की विश्ववसनीयता को और नुकसान हो."

प्रोफ़ेसर एसडी मुनि आगे कहते हैं, "मेरी व्यक्तिगत राय ये है कि पाकिस्तान में आज़ की राजनीतिक स्थिति में भी तमाम दलों में कहीं भी इस बात को लेकर मतभेद नहीं है कि भारत के साथ रचनात्मक और सकारात्मक संबध होने चाहिए. कश्मीर के मुद्दे पर ज़रुर मतभेद हैं क्योंकि इसमें विभिन्न दलों के अलग-अलग स्वार्थ हैं. इसलिए कश्मीर ज्यादा संवेदनशील मसला है."

 पाकिस्तान में आज़ की राजनीतिक स्थिति में भी तमाम दलों में कहीं भी इस बात को लेकर मतभेद नहीं है कि भारत के साथ रचनात्मक और सकारात्मक संबध होने चाहिए. कश्मीर के मुद्दे पर ज़रुर मतभेद हैं क्योंकि इसमें विभिन्न दलों के अलग-अलग स्वार्थ हैं. इसलिए कश्मीर ज्यादा संवेदनशील मसला है
एसडी मुनि, अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार

भारत और पाकिस्तान के रिश्तों में बदलाव आया है और दोनो ही देश रिश्तों को बेहतर बनाने, शांति प्रकिया को आगे बढ़ाने और तनाव को कम करने पर सहमत हैं. लेकिन पाकिस्तान में जो अनिश्चितता का माहौल है उसमें विदेश नीति कहीं पीछे खिसक गई है. मुशर्रफ़ की अपनी चिंताओं ने ज़रूर कुछ हद तक उनकी प्राथमिकताएँ बदल दी है.

वहीं पाकिस्तान के ‘द न्यूज़’ अख़बार की मरियाना बाबर कहती हैं, "जिस दौर से पाकिस्तान अभी गुज़र रहा है उसमें इसकों लेकर अनिश्चितता है कि मुशर्रफ़ की हुकूमत कब ख़त्म होगी, कब पाकिस्तान में चुनाव होंगे? ऐसे में भारत के साथ संबंध और विदेश नीति का मामला हुकूमत, राजनीतिक दल और आम आदमी के लिए भी प्राथमिकता की बीत नहीं है."

फ़ौजी नेतृत्व से बातचीत बेहतर?

भारत में विदेश नीति की समझ रखने वालों का एक ख़ेमा मानता है कि फ़ौजी हुकूमत से बात करना किसी लोकतांत्रिक नेतृत्व से बात करने से ज्यादा आसान होता है. क्योंकि लोकतंत्र में सभी को साथ लेकर चलना पड़ता है और कई तरह की दूसरी राजनीतिक मज़बूरियाँ भी होती हैं जबकि एक फ़ौजी शासक स्वयं निर्णय लेता है.

प्राथमिकता नहीं
 ऐसे में भारत के साथ संबंध और विदेश नीति का मामला हुकूमत, राजनीतिक दल और आम आदमी के लिए भी प्राथमिकता की बात नहीं है
मरियाना बाबर, पाकिस्तानी पत्रकार

इस बारें में एसडी मुनि कहते है कि अलग-अलग देशों की स्थिति के हिसाब से विदेश नीति तय की जाती है और फ़ौज बेहतर होती है, ऐसा हमेशा नहीं कहा जा सकता. वे कहते हैं, "उस व्यक्ति से बात करना आसान होता है जिसकी जड़े वहाँ की राजनीतिक व्यवस्था में गहरी होती हैं. जैसे पाकिस्तान और बर्मा - वहाँ फ़ौजियों की जड़े गहरी हैं. इसलिए फ़ौजी ज्यादा असरदार हो सकते हैं."

उनका कहना है, "हमने राजनीतिक नेताओं के साथ शिमला समझौता किया. लेकिन उसका ताना-बाना बिख़र गया. क्योंकि समझौते को राजनीतिक रुप में लागू करने के लिए फ़ौज की मंज़ूरी नहीं मिल सकी. ये कोई सिद्धांत नहीं है कि एक फ़ौजी के साथ बात करना हमेशा आसान होता है."

लेकिन यदि कुछ लोग फ़ौजी के साथ बात करना आसान मानते हैं तो क्यों मुशर्रफ़ के आठ साल के शासन में दोनो देशों के बीच कोई बड़ा समझौता नहीं हो पाया.

पाकिस्तान के पूर्व विदेश मंत्री सरताज अज़ीज़ यही सवाल करतें हैं, "अगर भारत ये मत है कि मुशर्रफ़ के साथ बातचीत करना आसान है तो पिछले 12-18 महीनें में मुशर्रफ़ साहब ने जो प्रस्ताव रखे थे, भारत को उन्हें मान लेना चाहिए था."

परवेज़ मुशर्रफ़ ने कश्मीर मुद्दे पर चार प्रस्ताव रखे, कहा गया कि उनका रुख़ लचीला रहा, उनकी सोच नहीं. भारत और पाकिस्तान के नेताओं ने ‘आउट ऑफ द बॉक्स’ यानी लीक से हटकर समाधान ढूढने की बात कही.

लेकिन जी पार्थसारथी का कहना है कि इन सबके बीच करगिल को भूला नहीं जा सकता, "क्या हम ये भूल सकते हैं कि कारगिल के युद्ध को किसने करवाया. इसके लिए कौन जिम्मेदार है. नवाज़ शरीफ़ खुद कहते हैं कि मुशर्रफ़ जिम्मेदार थे."

अंतरराष्ट्रीय समर्थन
 मुशर्रफ़ साहब ने जो भी प्रस्ताव रखें हैं और जिनके आधार पर बातचीत हो रही है उसके लिए पूरा अंतर्राष्ट्रीय समर्थन है. यूरोपियन संसद, अमरीका और संयुक्त राष्ट्र के महासचिव ने भी इसका समर्थन किया है. कोई नई सरकार वहाँ आए, तो यह नहीं कह सकती कि हम इन प्रस्तावों पर बात नहीं करेंगे
जी पार्थसारथी

'अंतरराष्ट्रीय समर्थन'

जी पार्थसारथी मानते हैं, "जो भी सरकार हो हम उनसे संपर्क बनाकर रखें. मुशर्रफ़ साहब ने जो भी प्रस्ताव रखें हैं और जिनके आधार पर बातचीत हो रही है उसके लिए पूरा अंतर्राष्ट्रीय समर्थन है. यूरोपियन संसद, अमरीका और संयुक्त राष्ट्र के महासचिव ने भी इसका समर्थन किया है. कोई नई सरकार वहाँ आए, तो यह नहीं कह सकती कि हम इन प्रस्तावों पर बात नहीं करेंगे. वैसे तो ज़िया साहब ने कहा था कि हम शिमला समझौते के आधार पर बात नहीं करेंगे. इसी तरह मुशर्रफ़ ने लाहौर घोषणा-पत्र को एक-दो साल के लिए रद्द करने की कोशिश की थी."

लेकिन ऐसा भी नहीं कि भारत की कश्मीर नीति में कोई दिक्कत नहीं है. यहाँ भी कई विचार और मतभेद हैं.

एसडी मुनि कहते हैं, "भारत में भी कश्मीर को लेकर कोई एक पुख़्ता राय नहीं है. यहाँ तक कि कश्मीर में किस ग्रुप के साथ बात होनी चाहिए, किसके साथ नहीं, सेना की तैनाती रहे या नहीं, इस पर कॉग्रेस और उसके सहयोगी दल पीडीपी में मतभेद नज़र आते हैं. इसलिए बातचीत आगे बढने के बावज़ूद भारत में इस बात पर सहमति नहीं बन पाई है कि कश्मीर पर दोनो देशों के बीच किस तरह का समझौता होना चाहिए. यहाँ भी कुछ न कुछ असमंजस तो है ही और इसका असर शांति प्रक्रिया पर भी पड़ रहा है."

इस समय जो लोग मुशर्रफ़ के सबसे नज़दीक थे, उनकी भी मुशर्रफ़ से दूरियाँ बढती जा रही है. मुशर्रफ़ सरकार के दो सबसे मज़बूत स्तंभ अमरीका और फ़ौज पर सबकी नज़र है. जहाँ अमरीका का हाथ अब भी मुशर्रफ़ पर है वहाँ भी अब आँखें मूँद कर साथ देने की बात नहीं होती. वहीं फ़ौज अब भी जनरल के साथ नज़र आती है.

पाकिस्तान में चुनाव कब होंगे, क्या बेनज़ीर और नवाज़ शरीफ़ पाकिस्तान लौटेंगे, क्या जनरल साहब अपनी वर्दी छोड़ेगें, इन सभी पर पाकिस्तान में जितनी चर्चा है उतनी ही शायद भारत सरकार में भी. क्योंकि यह कुछ हद तक तय करेगा कि सरक्रीक, सियाचिन और कश्मीर पर गाड़ी अटकी रहती है या उसे आगे बढाने का सिग्नल मिलता है.

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