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बुधवार, 13 जून, 2007 को 10:20 GMT तक के समाचार
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'उपहार' के पीड़ितों को न्याय की आस

उपहार सिनेमा हादसा
मृतकों के परिजन धीमी न्यायिक प्रक्रिया पर सवाल उठा रहे हैं
"उस हादसे को याद करना मेरे लिए बहुत मुश्किल है. काश कि मैं भी उस दिन अपने बच्चों के साथ ही ख़त्म हो गई होती तो शायद इतनी तकलीफ़ न होती. एक माँ-बाप के लिए यह सब देखना बहुत मुश्किल है..."

कहते-कहते नीलम कृष्णमूर्ति फूट पड़ती हैं और आंसुओं में दर्द की अनगिनत छवियाँ फिर से उभर आती हैं.

नीलम अपने दो बच्चों के साथ आज से 10 बरस पहले यानी 13 जून, 1997 को दिल्ली के उपहार सिनेमाघर में फ़िल्म बॉर्डर का दोपहर वाला शो देखने गई थीं.

पर बॉर्डर देखते-देखते ही सिनेमाघर आग की चपेट में आ गया और नीलम के बच्चों समेत 59 मासूम सदा के लिए ऐसी सीमा, ऐसे बॉर्डर के पार चले गए जहाँ से लौटना किसी के लिए संभव नहीं होता. हादसे में क़रीब 100 लोग घायल हो गए थे.

 मैंने अपनी 21 बरस की बेटी, तारिका खोई है. उसकी मंगनी हो चुकी थी. वो कंप्यूटर साइंस पढ़ रही थी और अमरीका जाकर वहीं परिवार बसाने वाली थी. आज अगर वो होती तो हम भी नाना बन गए होते पर अब वो नहीं, उसकी माला चढ़ी तस्वीर है हमारे पास. सारे सपने बिखर गए
नवीन साहनी, पीड़ित पिता

पिछले वर्ष जारी हुई जाँच की रिपोर्ट के मुताबिक सिनेमाघर से बाहर निकलने के रास्ते और सीढ़ियों के रास्ते को बंद रखा गया था जिसकी वजह से लोग बाहर नहीं निकल पाए और इतना बड़ा हादसा हो गया.

इस मामले में दिल्ली सरकार के कई अधिकारियों, उपहार सिनेमा के मालिक अंसल बंधुओं सहित 16 लोगों के ख़िलाफ़ मुक़दमा चल रहा है. इनमें से चार अभियुक्तों की मौत हो चुकी है.

दिल्ली के चर्चित उपहार सिनेमा हादसे को 10 बरस हो गए हैं पर मृतकों के परिवार आज भी न्याय की आस में हैं.

धीमी न्यायिक प्रक्रिया

हालांकि इस मामले की सुनवाई कर रहे दिल्ली हाईकोर्ट ने हाल-फिलहाल के आदेश में कहा है कि इस मामले से संबंधित सुनवाई अगस्त, 2007 तक ही पूरी कर ली जानी चाहिए पर पीड़ितों के लिए 10 बरस का इंतज़ार भी एक लंबी तकलीफ़ है.

उपहार सिनेमा
सिनेमाघर में उस वक्त बॉर्डर फ़िल्म दिखाई जा रही थी

नीलम का आरोप है कि इस मामले में जो लोग अभियुक्त हैं वही न्याय मिलने में देरी करवा रहे हैं और इसके लिए सीआरपीसी यानी दंड संहिता के कमज़ोर प्रावधान ही ज़िम्मेदार हैं.

वो कहती हैं, "ऐसे कई प्रावधान हैं जो अभियुक्तों के पक्ष में जाते हैं और इनका लाभ उठाकर वो बचते रहते हैं. अगर ऐसा हो चलता रहा तो देशभर की अदालतें न्याय की अर्जियों से पट जाएंगीं और लोगों को न्याय बहुत देर से मिलेगा."

नीलम ज़मानत के लिए लचीले नियमों पर चिंता व्यक्त करते हुए कहती हैं, "आज किसी का क़त्ल कर दें, आप दस लोगों को गाड़ी से कुचल दें, आप किसी सिनेमाघर में 60 लोगों को जान से मार दें लेकिन आपको ज़मानत आराम से मिल जाती है. आप बाहर हैं. आपका कारोबार चलता रहता है. आप घूमते-फिरते रहते हैं."

एक अन्य पीड़ित पिता नवीन साहनी कहते हैं, "मैंने अपनी 21 बरस की बेटी, तारिका खोई है. उसकी मंगनी हो चुकी थी. वो कंप्यूटर साइंस पढ़ रही थी और अमरीका जाकर वहीं परिवार बसाने वाली थी. आज अगर वो होती तो हम भी नाना बन गए होते पर अब वो नहीं, उसकी माला चढ़ी तस्वीर है हमारे पास. सारे सपने बिखर गए."

नवीन कहते हैं कि हम भले ही अपने बच्चे को खो चुके हों पर आगे से ऐसा किसी के साथ न हो इसके लिए हम अपनी लड़ाई तबतक जारी रखेंगे जबतक कि हमें न्याय नहीं मिल जाता है.

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