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बिना सुनवाई आधी उम्र कटी जेल में | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत के उत्तर प्रदेश राज्य के वाराणसी ज़िले में 38 वर्षों से बिना किसी सुनवाई के जेल की सलाखों के पीछे रहनेवाले एक वृद्ध व्यक्ति को सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद ज़मानत पर रिहा किया गया है. जगजीवन राम यादव नामक इस व्यक्ति को 1968 में कथित तौर पर अपने पड़ोसी की पत्नी की हत्या के आरोप में गिरफ़्तार किया गया था. तब उनको फ़ैज़ाबाद की एक अदालत में ले जाया गया था लेकिन उनपर आरोप नहीं दायर किए गए. बाद में जगजीवन की कभी कोई सुनवाई नहीं हुई और पुलिस ने भी ये स्वीकार किया कि उसके मामले के रिकॉर्ड खो गए हैं. बचाव पक्ष के एक वकील ने कहा कि 70 वर्ष के हो चुके जगजीवन यादव मानसिक तौर पर अस्थिर लग रहे थे और उनको एक मानसिक आरोग्यशाला में भेज दिया गया था. पिछले साल जुलाई में जब वे वापस जेल लाए गए तो जेल के अधिकारियों ने अदालत से संपर्क किया. मगर फ़ैज़ाबाद की एक स्थानीय अदालत ने जब काग़ज़ात माँगे तो जिस थाने में मामला दर्ज हुआ था उसने कहा कि वे खो गए हैं. इसके बाद ये मामला सुप्रीम कोर्ट ले जाया गया. वहाँ भारत के मुख्य न्यायाधीश वाई के सभरवाल ने फ़ैसला सुनाते हुए कहा,"हम ये आदेश देते हैं कि जगजीवन यादव को निजी मुचलके पर ज़मानत पर रिहा कर दिया जाए". परिवार जगजीवन यादव के परिवार के लोगों को तो ये पता ही नहीं था कि जगजीवन जीवित हैं. दरअसल मीडिया में ख़बर आने के बाद उनके रिश्तेदारों को उनका पता चला. उनकी पत्नी पत्तो देवी ने पिछले सप्ताह समाचार एजेंसी एसोसिएटेड प्रेस से बात की थी और अपने पति की रिहाई की गुहार लगाई थी. उन्होंने बताया कि पिछले 37 सालों से उन्होंने अपने पति को नहीं देखा जब उनको मानसिक आरोग्यालय ले जाया गया था. पत्तो देवी ने कहा,"हमें जब कोई सूचना ही नहीं मिली उनकी तो हम सबने सोचा कि वे नहीं रहे". जगजीवन यादव अब जल्दी ही अपने गाँव मिल्कीपुर लौटेंगे. |
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