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दंगा पीड़ितों को न्याय दिलाना है मिशन | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
पंजाब के भादौर गॉव में जन्मे 49 वर्षीय हरविंदर सिंह फूलका दिल्ली में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुए सिख विरोधी दंगों से काफ़ी विचलित हुए. उन्होंने दंगा पीड़ितों को न्याय दिलवाना अपना मिशन बना लिया. उच्चतम न्यायालय में वरिष्ठ वकील फूलका से बातचीत के अंश. न्याय मिलने में देरी होना, न्याय न मिलने के बराबर है. क्या आपको लगता है कि इतने सालों बाद पीड़ितों को न्याय मिलेगा? मुझे और मेरी टीम को पूरी उम्मीद है कि हमें न्याय मिलेगा और इसी उम्मीद के चलते हम पिछले बीस सालों से काम कर रहे है. जब नानावती आयोग का गठन किया गया था तो लोग पूछते थे कि 16 सालों में कुछ नहीं हुआ तो अब क्या होगा. पर मेरा कहना था कि 16 तो क्या 100 साल भी हो जाएँ हम इसे नहीं भूलेंगें. नानावती आयोग इस मामले पर बनाया गया नौवां आयोग है. अगर इस आयोग से भी इंसाफ़ नहीं मिला, तो हम आठ-नौ और आयोग बनाने में भी नहीं हिचकिचाऐंगें. वास्तव में यह सिखों से अघिक मानवाधिकार से जुड़ा मामला है. किस तरह के न्याय की उम्मीद है आपको? हमें दो तरह से उम्मीद है, एक तो दोषियों को सज़ा चाहे वो कितने ही बड़े ओहदे पर क्यों न हो और दूसरे पीड़ितों को राहत और उनका पुनर्वास . इन दंगों में पुलिस और न्यायपालिका की भूमिका पर सवाल उठते रहे हैं. क्या कहेंगें आप? नानावती आयोग के सामने पहली बार पेश किए गए पुलिस दस्तावेज़ों से साफ़ है कि पुलिस इन दंगों के दौरान मूक दर्शक न रह कर सिखों को क़त्ल करवाने में लगी रही. बड़े-बड़े ओहदों पर बैठे पुलिस अधिकारी भी इसमें शामिल थे. इस दौरान सिखों को गिरफ़्तार किया गया, उनके हथियार छीने गए और फिर उसके बाद उन्हें दंगाइयों के हवाले कर दिया गया. अगर पुलिस मूक दर्शक ही बनी रहती तो इतने ज़्यादा लोग नहीं मारे जाते, क्योंकि लोग अपनी आत्मरक्षा करते. दुर्भाग्य से न्यायपालिका का रोल भी इस मामले में ठीक नहीं रहा और दोषियों को बचाने में न्यायपालिका ने उनका साथ दिया. मामले में हो रही प्रगति को रोका गया और अड़चनें डाली जाती रहीं. जजों को बदला गया और उनके तबादले किए गए. सारी ताक़त पीड़ितों के शपथपत्रों में ग़ल्तियाँ ढ़ूँढ़ने में बेकार की गई. जाँच एजेंसियों ने भी अपना काम सही तरीक़े से नहीं किया. अगर इस मामले में सज़ा हो गई होती तो शायद गुजरात का मामला सामने न आया होता. इन बीस सालों में केंद्र में कई सरकारें बदलीं. क्या मामले पर इसका कुछ असर पड़ा? देखिए जब भी कॉग्रेस की सरकारें रहीं इस मामले को बंद करने की उनकी पूरी कोशिश रही. नेताओं की आपस में और पुलिस के साथ साँठगाँठ रही.
वीपी सिंह और भारतीय जनता पार्टी की राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकारों के दौरान मामला कुछ आगे बढ़ा. लेकिन उसमें भी उतनी प्रगति नहीं हुई जितनी हमें उम्मीद थी. जबकि जनता दल सरकार के समय मामला वहीं रुका रहा. इन दंगों के दौरान और अब भी कांग्रेस का ही शासन है. क्या आपको लगता है कि ऐसे में दंगा पीड़ितों को न्याय मिल पाएगा? जब नानावती कमीशन की रिपोर्ट आएगी तो इस सरकार की नीयत का पता चलेगा. लेकिन दूसरी ओर जिस तरह से सरकार ने इस मामले में फँसें लोगों को मंत्री और सांसद बनाया है. उससे यह साफ़ ज़ाहिर है कि सरकार अपनी तरफ़ से कोशिश करेगी कि पहले की तरह मामले को दबाया जाए. नानावती आयोग की रिपोर्ट आने के बाद ही पता चलेगा कि गुजरात मामले पर मचाया गया शोर सिर्फ़ ढकोसला ही था, या इस संबंध में ये वाकई कुछ करना चाहते हैं. नानावती आयोग बनने से पहले आप सरकार की ओर से वक़ील थे. ऐसा क्या हुआ कि आप दंगापीड़ितों की तरफ़ आ गए?
1998 में जब राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार आई तो मुझे उच्च न्यायलय में सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता बनाया गया. लेकिन जब नानावती आयोग बनाया गया तो हमारी नागरिक न्याय समिति के लोगों ने कहा कि मुझे सरकार की तरफ़ से ही मामले में आना चाहिए. लेकिन पीड़ितों की तरफ़ से किसी अच्छे वक़ील के सामने न आने से मैंने सरकारी पद से इस्तीफ़ा दे कर पीड़ितों की तरफ़ से आना ठीक समझा. साथ ही ये मुझे अपना नैतिक दायित्व भी लगा. कुछ सिख सगंठन इस मामले पर अन्तराष्ट्रीय न्यायालय में जाने की बात भी कर रहे हैं. क्या कहेंगें आप? अगर वो इस मामले को अन्तराष्ट्रीय न्यायालय के अधिकार क्षेत्र में ला सकते हैं तो ज़रुर लाना चाहिए. मैंने विदेश में बसे सिखों से कहा था कि अगर वो इस मामले में विदेशी विशेषज्ञों की व्यवस्था कर सकते हैं तो हम उन्हें पूरे कागज़ात और सहायता उपलब्ध करवा सकते हैं. जिस-जिस मंच पर भी हमें इंसाफ़ मिलने की उम्मीद है, हमें इस मामले को उठाना चाहिए और इस कार्रवाई को भारत विरोधी नज़रिए से नहीं देखा जाना चाहिए. इस तरह की घटनाओं को रोकने के लिए क्या क़ानूनी तौर पर कुछ किया जा सकता है? हम यह माँग उठा रहे हैं कि इस तरह की घटनाएँ रोकने के लिए एक विशेष क़ानून बनाया जाए. ऐसा देखा गया है कि जहाँ भी इस तरह के दंगे या क़त्ले-आम होते हैं, वो पुलिस और स्थानीय नेताओं के बीच गठजोड़ के चलते होते है. फिर बाद में जाँच का काम भी वही पुलिसवाले करते है. हमने कहा है कि जाँच का काम किसी बाहरी एजेंसी को सौपाँ जाए. गवाहों की सुरक्षा के लिए कार्यक्रम बने. हमने क़त्ले-आम से संबंधित एक क़ानून का मसौदा भी केंद्र सरकार के पास भेजा है. सरकार ने भी इस पर सहमति जताई है. क्या आपको लगता है कि नानावती आयोग इस मामले पर कुछ ठोस कर पाएगा? हमने इतने क़ागज़ात नानावती आयोग के सामने रखे हैं कि हमें पूरी उम्मीद है कि इस आयोग की रिपोर्ट में बंद हुए मामलों को फिर से खोला जाएगा. दोषियों पर मुक्दमें चलेंगें और उन्हें सज़ा मिलेगी. उन पीड़ितों को जिन्हें अभी तक मुआवज़ा नहीं मिला है, उन्हें मुआवज़ा मिलेगा. गुजरात दंगों के बाद जिस तरह का माहौल बना है, सरकार के लिए इस रिपोर्ट के दबाना या ख़त्म करना आसान नहीं होगा, जैसा कि पहले की सरकारों ने किया था. आज हालात बदले हुए हैं. |
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