|
'इंदिरा को राजनीतिक वारिस नहीं बनाया' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
पंडित जवाहरलाल नेहरू के समय की राजनीति और उनकी राजनीतिक विरासत पर इतिहासकार और लेखक रामचंद्र गुहा की राय- भारत की राजनीति में नेहरू-गाँधी ख़ानदान के महत्त्व पर काफ़ी चर्चा होती रही है मगर पंडित जवाहर लाल नेहरू की न तो कभी इच्छा थी और न ही वह समझते थे कि उनके बाद इंदिरा गाँधी प्रधानमंत्री बनेंगी. इस पूरी परंपरा को नेहरू-गाँधी ख़ानदान की न कहकर इंदिरा गाँधी ख़ानदान की परंपरा कहना चाहिए. इंदिरा जी की इच्छा थी कि उनके बेटे न सिर्फ़ राजनीति में आएँ बल्कि कांग्रेस का नेतृत्व भी करें. नेहरू और इंदिरा जी के बीच रिश्ता बाप-बेटी का था और उसे राजनीतिक रिश्ता नहीं माना जा सकता. नेहरू जी के बाद लाल बहादुर शास्त्री प्रधानमंत्री बने और उनके बाद कांग्रेस के नेताओं ने सोचा कि इंदिरा गाँधी को आगे करके वे शासन चलवा लेंगे. पंडित नेहरू के समय कांग्रेस में स्वस्थ लोकतंत्र था. जो बाद में नहीं रहा. उनके समय में राज्यों में भी कांग्रेस के नेता वहीं के लोग चुनते थे, उन्हें थोपा नहीं जाता था. उनके समय में कांग्रेस ज़्यादा लोकतांत्रिक थी. पंडित नेहरू का करिश्मा वैसे पंडित नेहरू का करिश्मा ये था कि वह एक धनी ख़ानदान से होते हुए भी सब छोड़कर बाप-बेटा जेल गए. पंडित जी के बारे में लोगों को लगता था कि वह अपने लिए नहीं बल्कि लोगों की सेवा के लिए राजनीति में आए हैं.
नेहरू जी और गाँधी जी को हर तबके, धर्म, क्षेत्र के लोग आदर सम्मान देते थे. वे वास्तव में पूरे देश के नेता थे. पंडित नेहरू के समय में कई तरीक़ों से लोकतंत्र मज़बूत हुआ और उसमें उनका योगदान काफ़ी रहा. उस समय विपक्ष को उन्होंने पूरा सम्मान दिया और उसे मज़बूत होने का मौक़ा दिया. वह विपक्ष का आदर करते थे. वह ख़ुद बहस में मौजूद रहते थे और मज़बूत विपक्ष को लोकतंत्र के लिए अच्छा मानते थे. उस समय अभिव्यक्ति की पूरी स्वतंत्रता थी. न्याय व्यवस्था और प्रशासन भी हस्तक्षेप से पूरी तरह मुक्त था. ऊँचा राजनीतिक क़द आज़ादी के बाद 1947 में जब सरकार बनी तो पंडित नेहरू के ही क़द के कुछ और नेता भी थे. इनमें सरदार वल्लभ भाई पटेल, सी राजगोपालाचारी और मौलाना अबुल कलाम आज़ाद थे.
ये नेता सभी मिल-जुलकर काम करते थे, जैसे पटेल जब राज्यों के एकीकरण और पार्टी को देख रहे थे तो पंडित नेहरू विदेश नीति को आगे बढ़ा रहे थे. जब पटेल का निधन हुआ और राजगोपालाचारी मद्रास चले गए तब यानी 1950 के बाद नेहरू जी ही भारतीय राजनीतिक पटल पर अकेले बड़े नेता रह गए. उस समय राज्यों के साथ भी केंद्र के संबंध अच्छे थे इसकी एक वजह ये भी हो सकती है कि राज्यों में भी कांग्रेस की ही सरकार थी. फिर जब 1957 के चुनाव में कम्युनिस्ट सरकार आई तो काफ़ी विवाद हुआ और वो सरकार बर्ख़ास्त की गई. पंडित जी के लोकतांत्रिक रिकॉर्ड पर यही एक काला धब्बा माना जा सकता है. |
| ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||