|
'सोशल चार्टर का विरोध करेगा निजी क्षेत्र' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
निजी क्षेत्र में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के आरक्षण के मुद्दे पर भारतीय उद्योग जगत पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि इसे जबरन थोपा नहीं जाना चाहिए बल्कि उनपर छोड़ देना चाहिए. इसके लिए उन्हें मजबूर नहीं किया जा सकता. सभी कंपनियाँ अपने-अपने तरीक़े से सोंचती हैं और नियुक्तियों में किसी तरह की दखलअंदाज़ी नहीं चाहतीं. जहाँ तक उद्योग जगत के लिए 'सोशल चार्टर' की बात है तो रतन टाटा पहले ही कह चुके हैं कि हम अपनी सामाजिक ज़िम्मेदारी जानते हैं और सरकार से नसीहत की जरूरत है. मुझे लगता है कि अभी भारतीय उद्योग जगत इसका विरोध करेगा. उनका ये मानना है कि खुले बाज़ार में जिस विशेषज्ञता की जितनी क़ीमत होगी उसे उतना दाम मिलेगा. जहाँ तक सीआईआई और एसोचैम जैसे संगठनों की कार्ययोजना का सवाल है तो ये देखने वाली बात होगी कि सभी कंपनियाँ इनको मानती हैं कि नहीं. प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने उद्योग जगत से आर्थिक प्रगति का लाभ ग़रीब आदमी तक पहुँचाने की जो बात कही है वो ज़्यादा बड़ी बात है. यह अभी अमरीका में भी बहस का मुद्दा बना हुआ है. मुझे लगता है कि प्रधानमंत्री ने सीआईआई में जो बात कही है वो कांग्रेस का नया नारा बनने वाला है. अगले दो साल में होने वाले आम चुनाव के दौरान कांग्रेस इस मुद्दे के साथ जा सकती है कि आर्थिक प्रगति से आम आदमी को क्या फ़ायदा मिला है. बढ़ती खाई शीर्ष प्रबंधकों को ज़्यादा वेतन देने के संदर्भ में उद्योग जगत का तर्क है कि भारत की उच्च शिक्षा प्रणाली इसके लिए ज़िम्मेदार है. उद्योगों का मानना है कि अगर आईआईएम और आईआईटी जैसे संस्थान अधिक होंगे तो दक्ष लोगों की आपूर्ति भी ज़्यादा होगी और इनका वेतन अपने आप कम हो जाएंगे. जहाँ नीचे के तबके के लोगों के लिए सामाजिक जवाबदेही की बात है तो टाटा, इन्फोसिस और आईसीआईसीआई जैसे फर्म इस दिशा में कुछ कर भी रहे हैं, लेकिन बड़े पैमाने पर कुछ नहीं हो रहा हैं. इसके लिए सरकार और उद्योग जगत को बैठकर इसे संस्थागत रुप देने का प्रयास करना चाहिए. पिछले कुछ वर्षों में दुनिया भर की अर्थव्यस्था में तेज़ी की वजह से उद्योग जगत का मुनाफ़ा बढ़ा है लेकिन इसका फ़ायदा केवल शीर्ष पर मौजूद लोगों और प्रमोटरों को ही मिला है. निचले और मध्यम स्तर के कर्मचारियों की आय में बमुश्किल दस प्रतिशत की सालाना बढ़ोतरी हुई है. इससे अंतर बढ़ता जा रहा है. वेतन को लेकर अमरीका में भी ये बात चल रही है कि वास्तविक वेतन वर्ष 2002 के स्तर से भी कम है यानी इस दौरान जिस गति से महँगाई बढ़ी है उस गति से वेतन में वृद्धि नहीं हुई है. भारत के संदर्भ में भी यही बात लागू होती है. संगठित और गैर-संगठित क्षेत्र में आम मज़दूरों का वास्तविक वेतन बढ़ नहीं रहा है. जबकि इसी समयावधि में शीर्ष अधिकारियों का वेतन तीन-तीन, चार-चार गुने बढ़ गए और उनको कंपनियों के शेयर भी मिले. इसका कारण अर्थशास्त्री ये बता रहे हैं कि फ़ायदा जो हो रहा है वो तकनीक और मशीनों के चलते हो रहा है, इसलिए इसका लाभ भी शीर्ष लोगों को ही मिला न कि मज़दूरों को. हालांकि प्रधानमंत्री ने जो कहा है इसके राजनीतिक निहितार्थ भी हैं. मार्क्सवादी पार्टी पहले से ही कहती रही हैं और कई कांग्रेसी भी इसको स्वीकार करते हैं कि आम आदमी तक आर्थिक प्रगति का लाभ न पहुँचने के चलते कांग्रेस कई राज्यों में चुनाव हारी है. (आलोक कुमार से बातचीत पर आधारित) | इससे जुड़ी ख़बरें आरक्षण का मामला संविधान पीठ को17 मई, 2007 | भारत और पड़ोस 'हार से कांग्रेस पर बढ़ेगा दबाव'12 मई, 2007 | भारत और पड़ोस आरक्षण पर हुई बैठक बेनतीजा रही25 अप्रैल, 2007 | भारत और पड़ोस आईआईएम फ़ैसले का इंतज़ार करेंगे20 अप्रैल, 2007 | भारत और पड़ोस मुसलमानों और ईसाइयों के लिए आरक्षण05 अप्रैल, 2007 | भारत और पड़ोस नक़सान हुआ फ़ायदों से अधिक08 सितंबर, 2005 | भारत और पड़ोस क्या आम आदमी पर नज़र है अदालतों की?25 अगस्त, 2005 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
| |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||