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गुरुवार, 08 सितंबर, 2005 को 10:11 GMT तक के समाचार
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नक़सान हुआ फ़ायदों से अधिक

वीपी सिंह
वीपी सिंह ने आनन फानन में मंडल आयोग की रिपोर्ट लागू करने का फ़ैसला किया था
मंडल कमीशन रिपोर्ट को लागू करना करना हिंदुस्तान की राजनीति में 40 वर्ष की एक प्रक्रिया का नतीजा था और एक बड़ी क्रांतिकारी घटना थी.

उसने देश की राजनीति में बहुत बड़ी तब्दीलियाँ लाने की संभावनाएं पैदा की थीं क्योंकि मंडल कमीशन की 12 सिफारिशें थीं. एक सिफारिश थी कि नौकरियों में आरक्षण दिया जाए. लेकिन बाक़ी 11 सिफारिशें बुनियादी तब्दीली की थी.

उसमें कहा गया था कि भूमि सुधार होना चाहिए, शिक्षा व्यवस्था बदलनी चाहिए और प्रशासन को बदलना चाहिए.

जब रिपोर्ट मान ली गई, तो समझा गया कि समूची रिपोर्ट मान ली जाएगी और उसको चुनिंदा तरीके से कार्यान्वित किया जाएगा. लेकिन दुर्भाग्य है कि उसके मात्र एक सुझाव जो नौकरियों में आरक्षण की थी, उसी पर ज़ोर दिया गया.

नतीजा ये हुआ कि वो सब क्राँतिकारी संभावनाएँ थीं वह सब बुझ गई.

मंडल कमीशन की रिपोर्ट को जाति केंद्रित व्यवस्था के विरोध में माना जाता है. माना जाता है कि कोशिश जाति को हिंदुस्तान की व्यवस्था से अलग करने की थी.

वह उद्देश्य जो लोहिया ने बताया, जो जयप्रकाश ने कहा और गाँधीजी चाहते थे कि हिंदुस्तान में जाति तो नहीं होनी चाहिए. काका कालेलकर आयोग के अध्यक्ष थे और उन्होंने कहा कि हम जाति के आधार पर पिछड़े वर्गां को आरक्षण नहीं देंगे.

कालेलकर की रिपोर्ट जब आई तो बाक़ी लोग चाहते थे कि आरक्षण के लिए जाति के आधार लिए जाने चाहिए. 1955 से लेकर 1978 तक मामला इसी बात पर रूका रहा कि हमें जाति के आधार पर हमें आरक्षण देना चाहिए या नहीं.

1977 में आई तो फिर यह मामला उठा और मंडल कमीशन बनाया गया.

लेकिन वो चुनावी राजनीति के दबाव में थे और दूसरे वे बहुत जल्दी में थे. उन्होंने 1980 में जब अपनी रिपोर्ट सौंपी तो उन्होंने इसे एकतरफ़ा अंतिम रुप दे दिया था और दूसरे इसे सौंपते हुए उन्होंने कहा, "मैं इसका विसर्जन कर रहा हूँ." शायद वो जानते थे कि ये लागू नहीं होगी.

दबाव और जल्दबाज़ी

मूलभूत तब्दिलियों की दिशा में ले जानी वाली इस रिपोर्ट को लागू करने के लिए जनता दल के लोगों ने वीपी सिंह पर बहुत दबाव डाला.

6 अगस्त 1990 को साढ़े पाँच बजे एक बैठक हुई. तो उसमें वीपी सिंह ने कहा, "मैं सबसे पहले मंडल कमीशन पर बात करना चाहता हूँ."

 वीपी सिंह ने रामविलास पासवान से कहा कि वे चर्चा शुरु करें. और पासवान जो एक दलित थे, ने पिछड़ों को आरक्षण देने के विषय पर चर्चा शुरु की और शरद यादव ने इसका ज़ोरदार समर्थन किया

सचिवालय के जितने लोग थे उतने लोग हैरान थे. वहाँ बीजी देशमुख थे और विनोद पांडे थे.

वीपी सिंह ने रामविलास पासवान से कहा कि वे चर्चा शुरु करें. और पासवान जो एक दलित थे, ने पिछड़ों को आरक्षण देने के विषय पर चर्चा शुरु की और शरद यादव ने इसका ज़ोरदार समर्थन किया.

अजीत सिंह ने कहा कि अगर आप करना चाहते हैं तो जाटों को भी दे दीजिए.

लेकिन कुछ लोगों ने जैसे कि मुफ्ती मोहम्मद ने कहा कि थोड़ा और समय ले लीजिए.

लेकिन वीपी सिंह ने कहा कि नहीं इस पर अभी चर्चा करना है और कुछ घंटों के बाद इस लागू कर दिया गया.

ये वरिष्ठ नौकरशाह बीजी देशमुख के की स्वीकारोक्ति है.

बाद में जो पता चला उससे पता चलता है कि देवीलाल को पार्टी से निकालने के लिए एक राजनैतिक सौदेबाज़ी में मंडल आयोग की रिपोर्ट लागू करने का फ़ैसला किया गया.

विडंबना

एक ऐसा बुनियादी दस्तावेज़ जिसमें बुनियादी तब्दीली की बात की थी राजनीतिक दबाव में एकाएक सात अगस्त को स्वीकार कर लिया गया और अगले दिन उसको संसद में पेश भी कर दिया गया.

मंडल का जो रेडिकल रूप था वह राजनीति में आ करके थोड़ा सा विकृत हो गया. इसलिए सिर्फ़ आरक्षण नौकरियों पर ही रहा बाकी चीज़ों के लिए पिछले 15 वर्षों में कुछ नहीं हुआ. देश की राजनीति का मंडलीकरण ग़लत हुआ है.

मुलायम सिंह यादव
पिछड़े वर्ग के नेता भी अगड़े वर्ग के किसी नेता जैसी ही व्यवस्था के साथ काम कर रहे हैं

मंडल के आधार पर होता तो मंडलीकरण ठीक होता, लेकिन मंडलीकरण दूसरी तरफ चला गया. इसकी एक वजह थी.

1955 से 1990 तक जो राजनीतिक वर्ग था वह ओबीसी को आरक्षण देने में भी विरोध करता था.

श्रीमती इंदिरा गाँधी कहा करती थीं कि इसकी क्या ज़रूरत है यह तो बैसाखी है, हमको तो मैरिट देखना चाहिए, राजीव गाँधी का बिलकुल एलानिया विरोध था मंडल कमीशन की रिपोर्ट पर. इसलिए उन्होंने दस साल टाल दिया.

इसलिए हिंदुस्तान का जो उच्च वर्ग था, राजनीतिक वर्ग था वो पिछड़ों को आरक्षण के विरोध में ही रहा है.

1955 से लेकर के 1990 तक उत्तरप्रदेश और बिहार में एक मध्यमर्ग पैदा हो गया था.वो डॉक्टर बन गए, वकील बन गए वो राजनीति में आ गए. जनता दल बन गया. तो उस क्लास का दबाव था.

तो इस वर्ग के दबाव में मंडल कमीशन की रिपोर्ट को लागू किया गया लेकिन उतना ही कार्यान्वित किया गया जितना उस क्लास को ज़रूरत थी.

वे सत्ता में भागीदारी के लिए आरक्षण चाहते थे.

सत्ता में भागीदारी की इस इच्छा की वजह से जो मंडल कमीशन की बुनियादी तब्दीली की बातें थीं वो कहीं और गुम हो गईं.

पिछले 15 वर्ष में हिंदुस्तान में मंडल की जो अनुशंसाएँ थीं वो पीछे रह गईं और जातिवाद उभरकर सामने आ गईं.

पिछड़ा वर्ग के जितने तबके हैं उसकी हालत ये है कि जो कि अब पिछड़ा वर्ग के भीतर जो उच्च वर्ग है वह पिछड़े वर्ग के ही निम्न वर्ग को दबाए रखता है. इस तरह से एक वर्ग के भीतर ही अब विभाजन हो गया है.

अब आर्थिक पिछड़ा वर्ग को आरक्षण देने की मांग हो रही है.

 पिछड़ा वर्ग के उच्च वर्ग का जो दबाव है वह अगड़े वर्ग के दबाव से बिलकुल भी अलग नहीं है

इस तरह लगता है कि मंडल ने जिस पिछड़े वर्ग के फ़ायदे की बात की थी दरअसल उनका नुक़सान हुआ है.

जाति व्यवस्था हिंदुस्तान में और मजबूत हो गई है. 1980 के दशक के बाद बिहार में लालू प्रसाद, राजस्थान में गहलौत, उत्तरप्रदेश में मुलायम सिंह जैसे नेता उभरे हैं.

इन सबके राजनीतिक संबंध हैं वह बड़े व्यापारी घरानों के साथ हैं. इनकी पार्टी की जो व्यवस्था है वह व्यक्तिवाद या परिवारवाद की है और ये से अलग लोगों को संरक्षण दे रहे हैं.

इसलिए पिछड़ा वर्ग के उच्च वर्ग का जो दबाव है वह अगड़े वर्ग के दबाव से बिलकुल भी अलग नहीं है.

आज 15 वर्ष के बाद हिंदुस्तान में मंडल कमीशन का जो नुकसान हुआ है उसके फायदों से अधिक है.

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