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शुक्रवार, 25 मई, 2007 को 15:18 GMT तक के समाचार
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नए निज़ाम के दरबार में पुराने दरबारी

ब्राह्णण गठजोड़
मायावती ने इस बार ब्राह्णणों को पार्टी से जोड़ा
अंग्रेज़ी के जाने-माने साहित्यकार विलियम शेक्सपियर के एक प्रसिद्ध कथन का अगर हिंदी में अनुवाद करें तो हम कहेंगे कि ख़ूबसूरती तो देखने वाले की आँखों में होती हैं.

कुछ यही बात इन दिनों मायावती के संदर्भ में लागू होती है. पिछले एक पखवाड़े में न तो मायावती बदली हैं, न उनकी राजनीति और न ही उनके बात करने का तरीक़ा.

बदला है तो सिर्फ़ उनका राजनीतिक क़द जिसके आगे देश के बड़े-बड़े नेता और बड़े-बड़े राजनीतिक दल बौने नज़र आने लगे हैं. ब्राह्मण, दलित और मुस्लिम समीकरण का मायावती फ़ॉर्मूला उत्तर प्रदेश में कुछ ऐसा 'हिट हुआ' कि दिल्ली में बैठे विशेषज्ञों और राजनीतिक पंडितों का अब मानना है कि मायावती का तूफ़ान आने वाले दिनों में और ज़ोर पकड़ सकता है.

बसपा का यूपी फ़ॉर्मूला अन्य राज्यों में भी अगर कामयाब हो गया तो फिर मायावती कि दिल्ली में भी प्रासंगिकता और बढ़ेगी.

शायद यही वजह थी कि शुक्रवार को मायावती की प्रेस कॉफ़्रेंस में नज़ारा कुछ ऐसा था जैसे कि यह किसी प्रधानमंत्री की प्रेस कॉंफ़्रेस हो.

हाल के दिनों में प्रधानमंत्री की भी किसी प्रेस कॉफ़्रेंस में मैंने इतने संवाददाताओं का जमावड़ा नहीं देखा.

मायावती की शैली

एक पाँचसितारा होटल का सबसे बड़ा हॉल खचाखच भरा हुआ था. संवाददाता ही नहीं ज़्यादातर अख़बारों और टीवी चैनलों के संपादक भी मौजूद थे और किसी को भी मायावती के बात करने के ढंग, प्रेस को उनके लताड़ने का अंदाज़ और अपने राजनीतिक विरोधियों को उनकी जगह दिखाने की शैली पर कोई आपत्ति नहीं थी.

 कल तक दिल्ली के कुछ पत्रकार जिस शैली को 'गंवारू' और कुछ अन्य 'बदतमीज़ी' तक करार देते थे आज वह मायावती के पत्रकारों को झिड़क देने के अंदाज़ पर ठहाके लगाते हुए दिखे जैसे मायावती की अनूठी और विशिष्ट शैली को दाद दे रहे हों
संजीव श्रीवास्तव

कल तक दिल्ली के कुछ पत्रकार जिस शैली को 'गंवारू' और कुछ अन्य 'बदतमीज़ीपूर्ण' करार देते थे आज वह मायावती के पत्रकारों को झिड़क देने के अंदाज़ पर ठहाके लगाते हुए दिखे जैसे मायावती की अनूठी और विशिष्ट शैली को दाद दे रहे हों.

मायावती के हर जवाब का ही नहीं उनकी चुप्पी और हाव-भाव का भी ऐसे विश्लेषण हो रहा था जैसे कि वह राजनीति और सार्वजनिक जीवन में कल ही आईं हों.

सत्ता के नज़दीक रहने वाले लोग सत्ता को आसानी से छोड़ते भी नहीं.

मायावती के उत्तर प्रदेश में आए तूफ़ान का चाहे पत्रकार पहले से अंदाज़ा नहीं लगा पाए, पर मायावती के राजनीतिक भविष्य की संभावनाओं से सब पूरी तरह से जुड़े रहना चाहते हैं.

ग़लत या सही, पर इस समय तो बहुत से प्रेक्षकों का आकलन यही है कि उत्तर प्रदेश के हाल के चुनाव नतीजे तो महज़ एक शुरुआत हैं और अगले कुछ वर्षों में मायावती और बसपा की ताकत और बढ़ने वाली है.

सत्ता का 'ग्लैमर' इस समय सबको मायावती में ही सबसे ज़्यादा दिख रहा है और इसीलिए आज सत्ता की नब्ज़ समझने की गलतफ़हमी रखने वाली दिल्ली की प्रेस का अंदाज़ कुछ वैसा ही था जैसा कि नए राजा के राज्याभिषेक में पुराने दरबारियों का होता है.

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