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'यूपीएससी अंक तालिका सार्वजनिक करे' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
दिल्ली उच्च न्यायालय ने कहा है कि संघ लोक सेवा आयोग यानी यूपीएससी की सिविल सेवा प्रारंभिक परीक्षाओं की अंक सूची को सार्वजनिक किया जाना पूरी तरह से उचित है. मंगलवार को अपने आदेश में हाईकोर्ट ने मुख्य सूचना आयुक्त (सीआईसी) के उस फ़ैसले को सही ठहराया है जिसमें यूपीएससी को निर्देश दिए गए थे कि वे प्रारंभिक परीक्षाओं में प्रतिभागियों को दिए गए अंकों की सूची सार्वजनिक करें. सीआईसी के नवंबर, 2006 में जारी इन निर्देशों में यह भी कहा गया था कि यूपीएससी प्रवेश परीक्षाओं की मॉडल उत्तर पुस्तिका भी सार्वजनिक करे. दरअसल, पिछले दिनों यूपीएससी की तैयारी कर रहे एक छात्र संदीप ने सीआईसी में सितंबर, 2006 में एक अपील दायर की थी जिसमें अनुरोध किया गया था कि यूपीएससी को प्रारंभिक परीक्षाओं की अंक तालिका और मॉडल उत्तर पुस्तिका सार्वजनिक करने चाहिए. इसपर चली सुनवाई के बाद सीआईसी ने यूपीएससी को ऐसा करने के निर्देश जारी कर दिए थे पर यूपीएससी ने यह कहते हुए इसे मानने से इनकार कर दिया कि इससे यूपीएससी की बौद्धिक संपदा को नुकसान पहुँचेगा और परीक्षा प्रणाली प्रभावित होगी. इसे दिसंबर 2006 में दिल्ली उच्च न्यायालय में चुनौती दी गई और जिसपर सुनवाइयों के बाद उच्च न्यायालय ने यह फ़ैसला सुनाया है. सकारात्मक फ़ैसला उच्च न्यायालय के इस फ़ैसले पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए याचिकाकर्ता संदीप ने बीबीसी को बताया, "हम न्यायालय के इस फैसले से बहुत खुश हैं. यह यूपीएससी परीक्षाओं में बैठ रहे लाखों प्रतियोगियों के लिए एक बहुत महत्वपूर्ण निर्णय है." उन्होंने कहा कि इससे न केवल प्रतियोगियों को लाभ हुआ है बल्कि यूपीएससी के कामकाज पर समय-समय पर लगते रहे आरोपों को भी रोका जा सकेगा. पारदर्शिता तय होने से यूपीएससी की छवि भी सुधरेगी और चयन की प्रक्रिया भी. वहीं सूचना आयुक्त ओपी केजरीवाल ने बीबीसी को बताया, "इस फ़ैसले से लाखों छात्र तो लाभान्वित हुए ही हैं, साथ ही कोर्ट ने पारदर्शिता और जवाबदेही तय करने की दिशा में सूचना आयोग के प्रयासों को भी स्वीकारा है और उनसे सहमति व्यक्त की है." याचिकाकर्ता संदीप बताते हैं कि कई राज्यों में प्रशासनिक सेवाओं की चयन प्रक्रिया में ऐसे प्रावधान हैं जहाँ प्रारंभिक परीक्षा के अंक और मॉडल उत्तर पुस्तिकाओं को सार्वजनिक किया जाता है या वेबसाइट पर उपलब्ध करवाया जाता है. ऐसे में केंद्रीय स्तर पर ऐसा क्यों नहीं किया जा सकता है. इस मामले में क़रीब 400 लोगों ने सीआईसी में अपील की थी और हाईकोर्ट की याचिका में क़रीब 40 प्रतियोगियों के हस्ताक्षर हैं. | इससे जुड़ी ख़बरें बिहार में कॉल सेंटर से मिलेगी 'जानकारी'28 जनवरी, 2007 | भारत और पड़ोस 'सरकार सूचना अधिकार को कमज़ोर कर रही है'06 अगस्त, 2006 | भारत और पड़ोस 'महिलाओं के लिए माहौल बदला है'22 जुलाई, 2006 | भारत और पड़ोस सूचना के अधिकार के लिए अभियान01 जुलाई, 2006 | भारत और पड़ोस सिविल सेवा परीक्षा में सफलता का राज़14 मई, 2006 | भारत और पड़ोस 'विषयों के चयन का कोई फ़ॉर्मूला नहीं'20 जून, 2004 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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