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रविवार, 28 जनवरी, 2007 को 20:47 GMT तक के समाचार
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बिहार में कॉल सेंटर से मिलेगी 'जानकारी'

बैनर
बिहार में ऐसे कॉल सेंटरों की शुरुआत देशभर में पहला प्रयोग है
भारत में सूचना का अधिकार क़ानून के तहत लोगों को जानकारी देने के लिए कॉल सेंटरों के इस्तेमाल का सबसे पहला प्रयोग बिहार राज्य में किया जा रहा है.

इन कॉल सेंटरों को नाम दिया गया है 'जानकारी' और ये आम लोगों को सूचना का अधिकार क़ानून के तहत जानकारी उपलब्ध करवाने में मदद करेंगे. इन कॉल सेंटरों की औपचारिक शुरुआत 29 जनवरी से की जा रही है.

राज्य सरकार की इस योजना के तहत अब लोग इन कॉल सेंटरों में फ़ोन करके अपनी ज़रूरत की जानकारी संबंधित विभाग से माँग सकेंगे. और तो और, सूचना माँगने का भुगतान भी फ़ोन के ज़रिए ही किया जा सकेगा.

सूचना माँगने के लिए 10 रूपए की फीस रखी गई है जो इन कॉल सेंटरों की मदद से सूचना माँगने की स्थिति में फोन करने वाले के टेलीफ़ोन बिल में ही शामिल कर ली जाएगी.

हालांकि ई-गवर्नेंन्स के कई और तरीके के प्रयोग देश के कुछ अन्य राज्यों में होते रहे हैं पर सूचना का अधिकार क़ानून को प्रभावी बनाने के लिए इस तरह का यह देशभर में पहला प्रयोग है.

अगर यह योजना प्रभावी तरीके से लागू हो पाती है तो लोगों को सरकारी विभागों से कोई भी जानकारी हासिल करने का एक आसान ज़रिया मिल सकेगा.

सरकारी शैली

दरअसल, आम लोगों के लिए किसी भी सरकारी विभाग से कोई जानकारी हासिल करना कोई आसान काम नहीं होता.

 इन कॉल सेंटरों को ऐसे ही लोगों को ध्यान में रखकर शुरु किया जा रहा है जो या तो अशिक्षित हैं और या फिर उन्हें सूचना माँगने के लिए एक सही आवेदन तैयार करने में दिक्कत होती है
चंचल कुमार, विशेष सचिव, मुख्यमंत्री सचिवालय

सूचना का अधिकार क़ानून का प्रयोग कर रहे कुछ लोगों का ऐसा अनुभव रहा है कि जब भी उन्होंने कोई जानकारी हासिल करने के लिए आवेदन दाखिल किया है, सरकारी अधिकारी आवेदन की भाषा और प्रारूप की कमियों का फायदा उठाकर जानकारी देने से बचते रहे हैं.

ऐसे में एक कम पढ़े-लिखे या अशिक्षित व्यक्ति के लिए तो सरकारी विभागों से जानकारी माँगना और भी कठिन काम है.

बिहार के मुख्यमंत्री सचिवालय के विशेष सचिव चंचल कुमार ने बीबीसी को बताया, "इन कॉल सेंटरों को ऐसे ही लोगों को ध्यान में रखकर शुरु किया जा रहा है जो या तो अशिक्षित हैं और या फिर उन्हें सूचना माँगने के लिए एक सही आवेदन तैयार करने में दिक्कत होती है."

चंचल बताते हैं, "इस योजना के शुरू होने के बाद लोगों को मीलों यात्रा करके ज़िले और राज्य के मुख्यालय तक आवेदन करने के लिए जाने की ज़रूरत नहीं रह जाएगी. लोगों की ज़रूरत के मुताबिक प्रारूप तैयार करना और संबंधित विभाग तक आवेदन पहुँचाने का जिम्मा इन कॉल सेंटरों का ही होगा."

इन कॉल सेंटरों को शुरू करने में मदद कर रहे जन संगठनों का कहना है कि ऐसा करने से लोगों के समय और पैसे दोनों की बचत होगी.

व्यवहारिक दिक्कतें

हालांकि इसे योजना के प्रभावी होने को लेकर कुछ सवाल भी उठाए जा रहे हैं.

 कॉल सेंटरों की भूमिका केवल आवेदन या अपील करवाने तक ही सीमित है. लोगों को पूरी और सही जानकारी देना विभागों के अधिकारियों की इस क़ानून के प्रति गंभीरता और उनकी अपनी कार्यशैली पर निर्भर करेगा

सूचना का अधिकार क़ानून और सरकारी विभागों की कार्यशैली पर काम कर चुके कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि कॉल सेंटरों के शुरू होने भर से ही सरकारी महकमे को जवाबदेह बनाने का काम पूरा नहीं होने वाला है.

जानकारों का मानना है कि कॉल सेंटरों की भूमिका केवल आवेदन या अपील करवाने तक ही सीमित है. लोगों को पूरी और सही जानकारी देना विभागों के अधिकारियों की इस क़ानून के प्रति गंभीरता और उनकी अपनी कार्यशैली पर निर्भर करेगा.

साथ ही उन लोगों के लिए इस योजना की उपयोगिता को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं जिन्हें अगर सूचना मिलती भी है तो वे उसे समझ पाने और इस्तेमाल कर पाने में अक्षम हैं.

ग़ौरतलब है कि सरकारी विभागों में कई सूचनाएँ ऐसी आधिकारिक और तकनीकी भाषा में होती हैं जिन्हें समझ पाना आम आदमी के बस में नहीं है. इस बारे में क़ानून में कोई ठोस प्रावधान नहीं है.

देखना यह है कि पहले से ही कई योजनाओं के हवा महल खड़े कर चुकी बिहार सरकार या अन्य राज्यों की सरकारें ऐसे प्रयोगों और सूचना का अधिकार क़ानून के प्रति कितनी ईमानदार कोशिश कर पाती हैं.

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