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'जनआंदोलनों को राजनीति में आना ही होगा' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
इस बार के लोकसभा चुनाव का एक ख़ास पहलू ये भी है कि जन-संगठनों ने ख़ुद चुनावी राजनीति में उतरने का फ़ैसला किया है. वैसे कई जनसंगठनों ने पिछले कुछ विधानसभा चुनावों में भी अपने उम्मीदवार उतारे थे. आम तौर पर जन-संगठनों का मानना है कि वे इस तरह देश की राजनीति में सीधे हस्तक्षेप से शायद कुछ बदल पाएँगे. हालांकि यह जनसंगठनों में इसे लेकर भी मतभेद है. देश की राजनीति में जिस तरह से राजनीतिक दलों का दबदबा है उसमें जनसंगठन किस तरह से अपनी जगह बना पाएँगे? इस सवाल के साथ जनसंगठनों की राजनीतिक शाखा 'पीपुल्स पॉलिटिकल फ़्रंट' की संयोजक अरुणा रॉय से हुई बातचीत के अंश. इस चुनाव में जनांदोलनों की क्या भूमिका है. पिछले एक साल में ये बात सामने आई है कि केवल मुद्दों पर आधारित राजनीति से बात नहीं बनेगी, जनांदोलनों को चुनावी राजनीति में भी आना होगा. दखल देने का इरादा इस बार साफ़ हुआ है लेकिन वो कैसे होगा और क्या होगा, इसपर काम करना बाकी है. ऐसे संगठनों का राजनीति में आना कितना उचित है. अब तक जन-संगठनों से पूछा जाता रहा है कि आप बदलाव लाने की बात करते हैं तो राजनीति में क्यों नहीं उतरते. दूसरे, ये चिंताजनक है कि इस देश में चुनाव एक 'इंज्वायमैंट पैकेज' बन गया है. ऐसे में एक नैतिक और पारदर्शी सरकार की ओर बढ़ने के लिए जन-संगठनों को आगे आना ही पड़ेगा. लेकिन मध्य प्रदेश और गुजरात के विधानसभा चुनावों के अनुभव बताते हैं कि जन-संगठनों के लिए चुनावी राजनीति शायद संभव नहीं, आपको क्या लगता है? ऐसा कतई नहीं है. देखिए, हम जाति और धर्म के आधार पर काम नहीं करते. मगर इस देश में पिछले पाँच दशकों में वोटों की राजनीति ने जाति-धर्म-भाषा के आधार पर वोट देने की पद्धति स्थापित कर दी है. इसे एक दिन में ख़त्म नहीं किया जा सकता है, थोड़ा वक्त लगेगा. क्या वजह है कि लोग जन-संगठनों की सभाओं में नज़र नहीं आते जबकि राजनीतिक दलों की रैलियों में हज़ारों लोग इकट्ठे हो जाते हैं? असल में लोगों की मानसिकता बन चुकी है कि अच्छे लोग शासन नहीं कर सकते. इसके अलावा लोग कई संकीर्ण वजहों के चलते बँटे हुए हैं. यही कारण है कि लोग अपनी मजबूरी या अज्ञानता के चलते इन दलों के साथ जाते हैं. आप की नज़र में देश के सामने सबसे अहम सवाल क्या हैं? हम धर्मनिरपेक्षता के संवैधानिक स्वरूप से सहमत हैं. सांप्रदायिक और फ़ासीवादी ताकतें देश के सामने सबसे बड़ी चुनौती हैं. कहने को तो हम राजनीतिक रूप से आज़ाद हैं, पर देश आर्थिक गुलामी में जकड़ा हुआ है. ऐसे में खुला-बाज़ार और वैश्वीकरण भी अहम सवाल है. तमाम अटकलें थीं कि आप इस बार चुनाव लड़ रही हैं. क्या इसकी संभावनाएं थीं और आप ने आगे चुनाव लड़ने का मन बना लिया है? नहीं, ये ग़लत है, मैं चुनाव लड़ूगी या नहीं, यह मेरा व्यक्तिगत मसला नहीं है. संगठन ने ये तय किया था कि मैं चुनाव न लड़ूँ और इसलिए मैं चुनाव नहीं लड़ रही हूँ. लेकिन अगर आगे संगठन की ओर से ऐसा तय होता है तो चुनाव लड़ने के बारे में सोचा जाएगा. |
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