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'विषयों के चयन का कोई फ़ॉर्मूला नहीं' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
सिविल सेवा परीक्षा 2003 में अव्वल रहीं रूपा मिश्रा का कहना है कि इस प्रतिष्ठित परीक्षा में विषयों के चयन का कोई फॉर्मूला नहीं है. उन्होंने कहा कि यह परीक्षार्थियों पर निर्भर करता है कि वे विषयों पर अपनी पकड़ के हिसाब से विषयों का चयन करें. बीबीसी हिंदी के कार्यक्रम आपकी बात बीबीसी के साथ में हिस्सा लेते हुए रूपा मिश्रा ने कहा कि विषयों के चुनाव में परीक्षार्थियों की रुचि और रुख़ पर बहुत कुछ निर्भर करता है. इस कार्यक्रम में रूपा मिश्रा के साथ-साथ हिंदी माध्यम से सफल रहे प्रशिक्षार्थी पुलिस अधिकारी हरिनारायणाचारी मिश्र ने भी हिस्सा लिया. दोनों का मानना था कि विषयों के चयन को लेकर परीक्षार्थियों के मन में परेशानी रहती है. लेकिन निदान ख़ुद की रुचि ही है. रूपा मिश्रा ने कहा, "मेरा मानना है कि आप उन्हीं विषयों का चयन करें जिनमें आप एक-दो वर्षों में परिश्रम करके महारत हासिल कर सकें. आप इन विषयों में लिखने और व्याख्या करने की ऐसी काबलियत हासिल कर सकें जो दूसरा न कर सके." दबाव 27 वर्षीय रूपा मिश्रा उत्कल यूनिवर्सिटी से एमबीए कर चुकीं हैं. वे उड़ीसा से सिविल सेवा परीक्षाओं में टॉप करने वाली पहली महिला हैं. हिंदी माध्यम से सफल रहे बिहार के हरियानारायणाचारी मिश्र ने कहा कि यह बात ग़लत है कि हिंदी माध्यम से परीक्षा देने वाले छात्रों को लाभ नहीं मिलता. परीक्षार्थियों के मनोवैज्ञानिक दबाव के बारे में दोनों का मानना था कि इतनी बड़ी परीक्षा के लिए यह स्वभाविक है लेकिन सफल तो वही होते हैं जो सकारात्मक दृष्टिकोण रखते हैं. नौकरशाही में राजनीतिक दख़ल के बारे में रूपा मिश्रा ने कहा कि सिविल सेवा का मतलब जनता की सेवा है और वे राजनेताओं को जनता का प्रतिनिधि मानतीं हैं. उन्होंने कहा, "दरअसल राजनेता लोगों की भावनाएँ हम तक पहुँचाते हैं. इसका मतलब यह तो बिल्कुल नहीं है कि आप किसी के अधीन काम कर रहे हैं या कोई आपको आदेश दे रहा है." लेकिन उन्होंने माना कि जीवन के हर क्षेत्र के दो पहलू होते हैं- नकारात्मक और सकारात्मक. आपको इन दोनों में संतुलन स्थापित करना होता है. |
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