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हाइकोर्ट के फ़ैसले पर प्रतिक्रियाएँ | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
उत्तर प्रदेश में मुसलमानों को अल्पसंख्यक न मानने के इलाहाबाद हाइकोर्ट के फ़ैसले पर राजनीतिक दलों की मिलीजुली प्रतिक्रिया सामने आ रही है. यह फ़ैसला ऐसे समय पर आया है जबकि उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं. भारतीय जनता पार्टी ने इस फ़ैसले का स्वागत किया है लेकिन ज़्यादातर अन्य दलों ने इस पर आपत्ति प्रकट की है. उत्तर प्रदेश के महाधिवक्ता एसएमए काज़मी ने बीबीसी से एक विशेष बातचीत में कहा है कि सरकार इस फ़ैसले को कल ही सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देगी. उन्होंने कहा, "अदालत ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर यह फ़ैसला दिया है और यह क़ानूनी चुनौती के सामने नहीं टिक सकता." मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड से जुड़े कमाल फ़ारूक़ी ने भी अदालत के फ़ैसले पर कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की है, उन्होंने कहा, "यह अदालत का काम ही नहीं है, यह काम अल्पसंख्यक आयोग का है कि वह तय करे कि कौन अल्पसंख्यक है और कौन नहीं." भारतीय जनता पार्टी के नेता राजीव प्रताप रूडी ने अदालत के इस फ़ैसले का स्वागत किया है, उन्होंने बीबीसी से बातचीत में कहा, "वे सारी पार्टियाँ जो तुष्टीकरण की राजनीति करती हैं उनके लिए यह एक गहरा आघात है और एक बड़ी चुनौती है. यह एक महत्वपूर्ण फ़ैसला है." राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष हामिद अंसारी ने बीबीसी से बातचीत में कहा, "सरकार ने 1992 में राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग का गठन एक क़ानून बनाकर किया था, यह क़ानून पूरे देश पर लागू होता है, सरकार ने एक अधिसूचना जारी करके कहा था कि मुसलमान, इसाई, सिख, पारसी और बौद्ध देश के अल्पसंख्यक हैं." उन्होंने कहा कि जब तक 1992 के राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग विधेयक में संशोधन नहीं होता तब तक किसी एक राज्य में स्थिति कैसे बदल सकती है. कांग्रेस के नेता राशिद अल्वी ने इस फ़ैसले के बारे में कहा, "यह फ़ैसला समझ से बाहर है, अल्पसंख्यक का मतलब होता है जिसकी संख्या कम हो, मुसलमानों की संख्या भारत में 13 प्रतिशत और उत्तर प्रदेश में 18 प्रतिशत है, इस तरह वे अल्पसंख्यक हैं." |
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