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सोमवार, 19 मार्च, 2007 को 20:08 GMT तक के समाचार
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मुलायम सिंह की मुश्किलें

मुलायम सिंह यादव
मुलायम सिंह की रणनीति कारगर नज़र नहीं आ रही हैं
'यूपी में है दम, क्योंकि जुर्म यहाँ है कम’ उत्तरप्रदेश के ब्राँड अंबेसेडर सुपर स्टार अमिताभ बच्चन द्वारा टीवी विज्ञापनों में बार-बार जपी जाने वाली यह चौपाई आजकल अख़बारों का भी सूत्र वाक्य बन गई है.

निठारी से संबंधित ख़बर हो या फिर राजधानी लखनऊ या अन्य शहरों में हो रहे ताबड़तोड़ जघन्य अपराध, यह पंक्ति ऐसे समाचारों में पिरोई हुई खूब फबती है.

इतना ही मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव को बौखला देने के लिए काफ़ी है.

आमतौर पर मीडिया से उत्तम जनसंपर्क रखने वाले मुलायम सिंह आजकल खासे चिड़चिड़े नज़र आते हैं.

सवाल से हल्की सी भी चुभन हुई भर मुलायम बस पलक झपकते बिदक जाते हैं.

‘काँग्रेस की हिम्मत हो तो...’ या ‘मेरी सरकार गिराने की विदेशी साजिश थी’ जैसे बिन सिर-पैर के बयानों की झड़ी लग जाती है.

असल में ऐन चुनाव के मौक़े पर तेज़ी से बदली स्थितियों ने मुलायम को झकझोर के रख दिया है.

पिछले वर्ष जुलाई से ही समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने ‘शेर आया’ चिल्लाना शुरू कर दिया था.

मुलायम सिंह और उनके रणनीतिज्ञों को पूरी उम्मीद थी कि चुनाव से पूर्व काँग्रेस उनकी सरकार को गिरा देगी.

इसी पेशबंदी में उन्होंने अगस्त 2006 से लगातार साढ़े चार माह विधानसभा चलाकर एक रिकॉर्ड कायम किया.

इसी बीच मुलायम ने 13 बार विश्वासमत प्राप्त कर एक विचित्र मिसाल भी पेश की.

पूरी उम्मीद थी कि सरकार गिरने से एक ज़बर्दस्त सहानुभूति लहर उठेगी जो साढ़े तीन साल के शासनकाल के दौरान उत्पन्न हुए अंतर्विरोध, खस्ताहाल क़ानून व्यवस्था, लचर प्रशासन और बढ़ते भ्रष्टाचार को धो-पोंछ कर पार्टी को एक बार फिर नया जीवनदान देगी.

बढ़ती बेचैनी

जब नौ जनवरी को राष्ट्रीय लोकदल के मंत्रियों ने सरकार से इस्तीफ़ा दिया और पार्टी अध्यक्ष अजीत सिंह ने सरकार को जमकर खरी-खोटी सुनाई तब मुलायम सिंह को यकीन हो गया था कि काँग्रेस अब उनकी सरकार गिराने की उल्टी गिनती शुरू कर चुकी है.

तुरंत ही काँग्रेस, सोनिया गाँधी और राज्यपाल टीवी राजेश्वर पर आक्रमण तेज़ हो गया.

18 जनवरी को जब काँग्रेस और राष्ट्रीय लोकदल ने राज्यपाल को समर्थन वापसी के पत्र सौंपे, मुलायम ने 25 जनवरी को फिर से सदन में बहुमत सिद्ध कर दिया.

उच्चतम न्यायालय द्वारा 14 फरवरी को 13 बसपा के बागी विधायकों की सदस्यता भंग किए जाने के बाद तो लगने लगा कि मुलायम सरकार की छुट्टी होने वाली है.

लेकिन चुनाव आयोग ने 21 फ़रवरी को अचानक उत्तरप्रदेश के सात चक्रों के चुनाव घोषित कर दिए. सारे राजनीतिक कयास धरे रह गए.

सर्वोच्च न्यायालय के पहली मार्च को दिए गए आय से अधिक संपत्ति मामले में सीबीआई जाँच के आदेशों के उपरांत एक बार फिर मुलायम सिंह की बर्ख़ास्तगी की संभावनाओं ने ज़ोर पकड़ा.

लेकिन ऐसा नहीं हुआ और शायद इसी कारण मुलायम की चुनावी रणनीति भरभरा कर बैठती नज़र आ रही है.

वामपंथी दलों की सहानुभूति जुटाकर एक नए मोर्चे के गठन की तस्वीर पेश कर वोटर के लुभाते मुलायम अब सीबीआई से सहयोग न करने या फिर स्वयं और परिवारवालों को जेल भेजने की साजिश की दुहाई देते नज़र आ रहे हैं.

बदली परिस्थितियाँ

2007 का विधानसभा चुनाव शायद पहला ऐसा अवसर है जब मुलायम सिंह के पास न तो कोई ठोस राजनीतिक फ़ार्मूला है और न ही किसी मज़बूत गठबंधन का सहारा.

सात चरणों में उत्तरप्रदेश के ऐतिहासिक चुनाव को झेलना किसी भी दल के लिए ख़ासी चुनौती है ही लेकिन यह सरकार में रहकर सारी विपरीत स्थितियों की गठरी ढोते हुए मुलायम सिंह की रातों की नींद हर सकता है.

मुलायम सिंह यादव
चारों तरफ से घिर गए लगते हैं मुलायम.

चुनाव आयोग की पैनी निगाहों के नीचे से वोट चुराने के किसी भी मनसूबे से समाजवादी पार्टी को दूर ही रहना होगा.

प्रदेश की सारी समस्याएँ जहाँ की तहाँ हैं. मुलायम सिंह के पारंपरिक जनाधार पर भी सेंध लग चुकी है. एक तरफ़ तो ऊँची जातियाँ बसपा को भी गले लगाने से गुरेज़ नहीं कर रही हैं तो दूसरी ओर मुस्लिम मतदाता भी मायावती या काँग्रेस को विकल्प के रूप में स्वीकारता दिख रहा है.

सदा से भाजपा के विरुद्ध धर्मनिरपेक्षता की जंग का सहारा लेकर चुनाव लड़ने वाले मुलायम इस बार काँग्रेस से ही कुश्ती लड़ते नज़र आ रहे हैं.

वैसे भी पिछले चुनाव में मात्र 88 सीटें पाकर हाशिए पर आई भाजपा को अभी भी प्रदेश में फिर से पैर जमाने का कोई विशेष मौक़ा हाथ नहीं लगा है.

भाजपा का कमजोर होना यकीनन मुलायम के लिए शुभ संकेत नहीं है. दोनों एक दूसरे के राजनीतिक पूरक से रहे हैं.

ऐसे में समाजवादी पार्टी का वोटर ख़ासतौर से मुस्लिम मतदाता एकजुट नहीं हो पाता है. काँग्रेस से भिड़ने से तो मुलायम के हाथ शायद ही कुछ लगे.

रणनीति का अभाव

इससे भी अधिक महत्वपूर्ण पहलू है कि समाजवादी पार्टी के पास इस बार कोई विजयी विकल्प नहीं है.

अपने दम पर सरकार बनाना शायद अब किसी भी दल के बूते की बात नहीं है.

ऐसे में मुलायम की पार्टी मौजूदा 134 विधायकों के लक्ष्य को फिर प्राप्त कर ले तो यही अनहोनी होगी.

मुलायम के सारे राजनीतिक साथी उनसे किनारा कर चुके हैं. विडंबना यह है कि भाजपा को छोड़कर मुलायम को किसी भी पार्टी का साथ मिलने की संभावना नगण्य है.

दूसरी ओर बसपा एक शक्तिशाली विकल्प के रूप में उभर चुकी है. वह काँग्रेस से भी गलबहियाँ कर सकती है और पुरानी सहयोगी भाजपा से भी उम्मीदें रख सकती है.

इन परिस्थितियों में समाजवादी पार्टी फिर से सरकार बनाने की कूवत रख सकेगी, कहना मुश्किल है.

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