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बाढ़ से बदलती रेगिस्तान की तस्वीर | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
राजस्थान में पाकिस्तान की सरहद से लगे थार मरुस्थल में पिछले वर्ष आई बाढ़ ने भारी विनाश किया था. ये रेगिस्तानी हिस्सा इस आपदा से अब तक उबर नहीं पाया है. पर्यावरण कार्यकर्ताओं का कहना है कि यह बाढ़ सुनामी के बाद के जलवायु परिवर्तनों का नतीज़ा है. वहीं कुछ वैज्ञानिक इसे तापमान में हो रही बढ़ोत्तरी 'ग्लोबल वार्मिंग' से जोड़कर देखते हैं. बाढ़ के बाद बाड़मेर ज़िले के रेगिस्तानी इलाकों में कई परिवर्तन देखे जा रहे हैं. जगह-जगह नए जीव-जंतु और वनस्पतियाँ दिखाई पड़ रही हैं. सरकार जहाँ बाढ़ से प्रभावित लोगों के पुनर्वास में लगी है वहीं पर्यावरण कार्यकर्ता अभी भी इस प्राकृतिक आपदा के कारण खोजने में लगे हैं. जयपुर में भू-सर्वेक्षण विभाग के निदेशक डॉक्टर आरएस गोयल कहते हैं, "ग्लोबल वार्मिंग हो रही है यह सही बात है. लेकिन यह इतनी भी ज़्यादा नहीं हो रही कि कोई बड़ा संकट हो जाए. ग्लोबल वार्मिंग में आदमी का योगदान दो प्रतिशत है. 95 फ़ीसदी प्रकृति की वजह से है इसलिए बाड़मेर की प्राकृतिक आपदा के बारे में तत्काल कुछ कहना जल्दबाज़ी होगी." वहीं 'स्कूल ऑफ़ डेज़र्ट साइंस' के डॉक्टर एसएम मोहनोत लंबे समय से रेगिस्तान में हो रहे परिवर्तनों पर नज़र रखे हुए हैं. वे बाड़मेर में आई बाढ़ को सुनामी जैसी प्राकृतिक घटना से जोड़कर देखते हैं. ग्लोबल वार्मिंग डॉ मोहनोत कहते हैं, "सुनामी के बाद ऐसी घटनाएँ होती रही हैं. इसे भी सुनामी के संदर्भ में देखा जाना चाहिए. लेकिन सुनामी का संबंध ग्लोबल वार्मिंग, अल-नीनो और ला-नीनो से भी है." डॉक्टर मोहनोत कहते हैं, "रेगिस्तान में मौसम बदल रहा है. रेगिस्तान में हाल के महीनों में ऐसा होना अप्रत्याशित है. ऐसा पहले कभी नही हुआ. ये मौसम के बदलाव का नतीजा है जो कुछ हद तक सुनामी से जुड़ा हुआ है. आने वाले समय में भी ये बदलाव दिखलाई देगा जो बहुत गंभीर होगा." डॉक्टर मोहनोत बताते हैं कि पिछली एक सदी में इस रेगिस्तानी इलाके में 19 बार बाढ़ आई है. एक बार आने के बाद फ़िर यह अगले एक-दो साल तक नहीं आती है. बाड़मेर के ज़िला कलेक्टर सुबीर कुमार वैज्ञानिकों से बातचीत के बाद कहते हैं, "यह एक रेगिस्तानी सुनामी था. यह पश्चिमी विक्षोभ था, जो ग्लोबल वार्मिंग से उपजा. कुछ अल-नीनो का भी प्रभाव था. ये सब मिलकर प्रभावी हुए और तीन दिन में 500 मिमी तक बरसात हो गई. इसने एक नदी का आकार ले लिया. बाढ़ के पानी की ऊँचाई 34 फीट तक जा पहुँची जो इस भू-भाग में तबाही मचा गई." बाढ़ बाड़मेर में बाढ़ के पानी की निकासी अब भी चुनौती बनी हुई है क्योंकि रेगिस्तान इतनी बड़ी जल राशि के लिए तैयार नहीं था. प्रकृति का यह प्रकोप अपने साथ बदलाव की सौगात भी लाया.
बाड़मेर में वनस्पतिशास्त्र के प्राध्यापक डॉक्टर नरेंद्र मोहन सुराणा बताते हैं, "बाढ़ का पानी सड़ने लग गया है. मरुस्थल की खेजड़ी, रोहिड़ा और बबूल जैसी वनस्पतियाँ जलने लगी हैं. पत्तियाँ मुरझाने लगी हैं. कुछ नए कीट पैदा हो गए हैं. मेढ़क की नई प्रजातियां भी देखने को मिल रही हैं." सुराणा बताते हैं कि इस बाढ़ प्रभावित क्षेत्र में जस्ता धातु काफ़ी है जो पानी में मिल गया है. मरुस्थल में पाए जाने वाली वनस्पतियाँ जस्ते की यह मात्रा सहन नहीं कर सकते इसलिए वृक्ष सूखने लगे हैं. नए कीट-पतंगे आना भी ठीक नहीं है. स्कूल ऑफ डेजर्ट साइंस के डॉक्टर एसएम मोहनोत बताते हैं कि ऐसी बाढ़ से पारिस्थितिकी में बदलाव निश्चित है. वनस्पति में बदलाव आया है और सूखी धरती में जल-स्तर बढ़ने लगा है. वनस्पतियों का चक्र बदल गया है, मछलियाँ पाई जाने लगी हैं, मच्छरों की नई क़िस्में आ सकती है. लेकिन यह उसी क्षेत्र तक सीमित है जहाँ बाढ़ आई है. नए कीट-पतंगे नुकसान भी कर सकते हैं. लेकिन इसका अध्ययन करने में समय लगेगा. नुकसान बाढ़ से हुई बर्बादी ऐसा दृश्य प्रस्तुत करती है जैसे प्रकृति ने वहाँ धरती पर कोई भयानक लड़ाई लड़ी हो. बाड़मेर कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिक प्रदीप पगारिया ने इस नुकसान का अध्ययन किया है. वे बताते हैं कि बाढ़ से बाड़मेर और जैसलमेर के 12 प्रतिशत गाँवों में चिकनी मिट्टी जमा हो गई है, 33 प्रतिशत गाँवों में तलछट, 37 प्रतिशत गाँवों के खेतों में कदराइस उभर आई है और 30 फ़ीसदी गाँवों में भू-क्षरण हुआ है. लेकिन चिकनी मिट्टी जमाव वाले खेतों में उर्वरा शक्ति बढ़ जाने की संभावना है. पर्यावरण कार्यकर्ता डॉक्टर केसरीमल केसरी को थार पारिस्थितिकी का अच्छा ज्ञान है. वे बताते हैं, "धरती का जल स्तर बढ़ा है, गुणवत्ता भी सुधरी है. कुछ जगह मरुस्थल हरा-भरा हुआ है लेकिन मौसम का बदलता मिजाज़ चिंता पैदा करता है. पिछले चार-पाँच साल से तापमान लगातार बढ़ रहा है." थार मरुस्थल ने सदियों तक सूखे का संताप झेला है लेकिन ऐसी भीषण बाढ़ रेगिस्तान के लिए नया अनुभव है. शायद ऐसी विपदा से निपटने के लिए रेगिस्तान अभ्यस्त नहीं था. |
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