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'इस तबाही को रोका जा सकता था' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
राजस्थान की बाढ़ प्रकृति निर्मित नहीं बल्कि मानव निर्मित है. यह राजस्थान के पारंपरिक जल प्रबंधन व्यवस्था के ख़त्म होने से हुआ है. पहले जब पानी बरसता था तो वहाँ के झालरों और तालाबों में इकठ्ठा होता था. लेकिन इस व्यवस्था के चरमराने से और तालाबों और झालरों में मिट्टी जमा होने से सौ घंटे तक बारिश होने से यह पानी अब वहाँ बहता है जहाँ ज़मीन गहरी होती है. एक तरह से प्रगति का जो रास्ता हमने अपनाया है उसी का परिणाम है कि कहीं अत्यंत सूखा और कहीं बाढ़ की तबाही बार-बार सामने आ रही है. हमें यह ध्यान में रखना चाहिए कि इतनी बारिश कोई अनहोनी घटना नहीं है. पिछले 102 सालों में पहले भी ऐसा हुआ है. 1996 में ही चौबीस घंटों में 300 मिलीमीटर बारिश हुई जबकि इस बार 100 घंटों में 577 मिली मीटर बारिश हुई. तो औसतन देखा जाए तो यह अनहोनी नहीं है. बाड़मेर में जिस पैमाने पर तबाही हुई है वो प्रशासन की विफलता है. सरकार सौ घंटे में इससे बचने के लिए बहुत कुछ कर सकती थी. यह बात सही है की बाड़मेर में इस तरह की बाढ़ के निकास के लिए नाले नहीं हैं. लेकिन सौ घंटों में सरकार पानी के बहाव की दिशा को बदलने के लिए कदम उठा सकती थी. वहाँ से लोगों को हटाया जा सकता था, समय रहते लोगों को बाढ़ की आशंका की जानकारी दी जा सकती थी. सबसे पहले मौसम विभाग को इस क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति के अनुसार बेहतर अनुमान लगाना सीखना होगा और यह जानकारी लोगों तक पहुँचाने की व्यवस्था करनी होगी. दूसरी बात पारंपरिक जल प्रबंधन की व्यवस्था दोबारा बहाल करने के लिए प्रयास होने चाहिए. एक जनोन्मुखी विकेंद्रीकृत जल प्रबंधन को हमें बढ़ावा देना चाहिए. अनीश अहलूवालिया के साथ बातचीत पर आधारित |
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