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शनिवार, 12 अगस्त, 2006 को 17:04 GMT तक के समाचार
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प्रभावित इलाक़ों में सहायता की सच्चाई

आंध्र प्रदेश
कई इलाक़ों में सहायता सामग्री के लिए लंबी कतारें देखी जा सकती है
जब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह आंध्र प्रदेश के बाढ़ पीड़ितों के लिए 200 करोड़ रुपए की अतिरिक्त सहायता राशि की घोषणा कर रहे थे, लगभग उसी समय रेगुलापाड़ू गाँव के आदिवासी किसी तरह की सहायता न मिलने की शिकायत कर रहे थे.

गाँव के युवक सिद्धारमैया कहते हैं कि उनके गाँव की तरह पाँच और गाँव भी पास में है जहाँ बाढ़ राहत पहुँचाने के लिए आज तक कोई भी नहीं आया है.

खम्माम ज़िले के भद्राचलम से क़रीब 35 किलोमीटर दूर स्थित रेगुलापाड़ू गाँव राज्य के उन 5400 गाँवों में से एक है जिन्होंने हाल के सैलाब की विभीषिका झेली है.

मदद के अभाव में ग्रामीण बहुत नाराज़ हैं. वे कहते हैं, "सोनिया गांधी आती हैं, राजशेखर रेड्डी आते है और भद्राचलम से लौट जाते हैं, वह भी सिर्फ़ हवाई दौरा कर. कोई हमारी सुधि नहीं लेता."

शिकायत

ऐसी भी ख़बरें आ रही हैं कि खम्माम के कई आदिवासी इलाकों के दस हज़ार लोगों को पहाड़ियों पर पनाह लेनी पड़ी है. एक सप्ताह बीत जाने पर भी प्रशासन इन आदिवासियों को मदद पहुँचाने में नाकाम रहा है.

शिकायत
 सोनिया गांधी आती हैं, राजशेखर रेड्डी आते है और भद्राचलम से लौट जाते हैं, वह भी सिर्फ़ हवाई दौरा कर. हमारी कोई सुधि नहीं लेता
एक ग्रामीण

मूल्लूरू गाँव के रामबाबू गंभीर अंदाज़ कहते हैं, "यह सरकार सोचती है कि हम पोलावरम परियोजना के ख़िलाफ़ है और इसी कारण वह हमें कोई भी मदद नहीं पहुँचा रही."

खम्माम ज़िले में 12 प्रखंडों के क़रीब 200 से अधिक आदिवासी गाँवों के लोग पोलावरम सिंचाई परियोजना का विरोध कर रहे हैं.

सरकार का कहना है कि गोदावरी नदी पर बन रही इस परियोजना से तीन ज़िलों कृष्णा, पूर्वी और पश्चिम गोदावरी के सात लाख हेक्टेयर कृषि भूमि को सिंचाई का फ़ायदा होगा.

लेकिन इस परियोजना के कारण 272 गाँव डूब जाएँगे. ग़ैर सरकारी सूत्र ऐसे गाँवों की संख्या 400 से अधिक बताते हैं.

विरोध की सज़ा?

उड़ीसा और छत्तीसगढ़ की सीमा से लगे इन इलाक़ों में परियोजना का विरोध इतना ज़्यादा है कि जगह-जगह ग्रामीणों ने बोर्ड लगा रखे हैं– अगर कोई पोलावरम की बात करना चाहता है तो हमारे पास आए.

बाढ़ से राज्य के कई इलाक़े प्रभावित हुए हैं

आदिवासी नेता के सुब्बाराव का कहना है कि परियोजना न सिर्फ़ पर्यावरण के लिए नुकसानदेह है बल्कि इसके बनने से आदिवासी संस्कृति और उसके पुरातन आचार-व्यवहार को गहरा झटका लगेगा और एक लाख 80 हज़ार आदिवासी बेघर हो जाएँगे.

ऐसी स्थिति में बाढ़ के बीच सरकारी रवैए को ग्रामीण पोलावरम के विरोध की सज़ा बताते हैं.

स्वयंसेवी संस्था में काम करने वाले शेख शाहजहाँ ग्रामीणों की भावना व्यक्त करते हुए कहते हैं कि ये लोग सोच रहे हैं कि सरकार इसी बहाने उनसे ज़मीन ख़ाली करवा लेना चाहती है जिसके लिए उन्होंने अभी तक हामी नहीं भरी थी.

प्रशासन इन आरोपों को निराधार बताता है. उसका कहना है कि राहत कार्यों में शिकायतों को वह दूर करने की कोशिश करेगा. लेकिन बाढ़ राहत और पोलावरम का कोई लेना-देना नहीं.

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