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बुधवार, 04 अप्रैल, 2007 को 19:41 GMT तक के समाचार
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पंचायत ने क्रिकेट पर प्रतिबंध लगाया

गांव में क्रिकेट
भारत में ग्रामीण स्तर पर भी क्रिकेट ख़ासा लोकप्रिय हो गया है
हरियाणा के जिंद ज़िले की एक पंचायत ने क्रिकेट के खेल पर प्रतिबंध लगा दिया है. हालांकि प्रतिबंध की वजह भारतीय टीम का विश्व कप में प्रदर्शन नहीं, सट्टेबाज़ी से बिगड़ते स्थानीय लोग हैं.

चौकन गोत्र के लोगों की इस पंचायत के दायरे में आसपास के 28 गाँव आते हैं.

इन गांवों की पंचायत ने क्रिकेट सहित कुछ अन्य मुद्दों पर विचार विमर्श करने के लिए एक पंचायत बुलाई जिसमें पंचायत के सभी गांवों में क्रिकेट को प्रतिबंधित करने का फ़ैसला लिया गया.

इसके अलावा पंचायत के प्रस्ताव में शादियों में पाश्चात्य शैली का डीजे संगीत, खुदरा बिकनेवाली शराब और शादियों में दहेज देने-लेने पर प्रतिबंध की भी बात कही गई है.

पंचायत के एक प्रतिनिधि राजीव ने बीबीसी को बताया, "दरअसल ऐसा क्रिकेट के ज़रिए बढ़ रही सट्टेबाज़ी को रोकने के लिए किया जा रहा है. युवा पीढ़ी के लोग कुश्ती, कबड्डी और बॉलीबॉल जैसे शारीरिक खेल छोड़कर क्रिकेट खेल रहे हैं. इन खेलों की उपेक्षा करते हुए युवाओं का जो क्रिकेट की तरफ़ रुझान है, उसे रोकने के लिए ऐसा फ़ैसला लिया गया है."

क्रिकेट से नुकसान

उन्होंने बताया कि क्रिकेट की वजह से सट्टेबाज़ी बढ़ गई है और इससे लोगों को काफ़ी नुकसान भी उठाना पड़ रहा है.

 पिछले दिनों में ऐसे मामले सामने आए हैं जहाँ युवाओं ने क्रिकेट की सट्टेबाज़ी में पैसा लगाने के लिए अपने घरों का सामान तक बेंच दिया है. इससे नुकसान हुआ है और लोगों पर ग़लत असर पड़ा है
राजीव, पंचायत प्रतिनिधि

राजीव बताते हैं, "पिछले दिनों में ऐसे मामले सामने आए हैं जहाँ युवाओं ने क्रिकेट की सट्टेबाज़ी में पैसा लगाने के लिए अपने घरों का सामान तक बेंच दिया है. इससे नुकसान हुआ है और लोगों पर ग़लत असर पड़ा है."

उन्होंने बताया कि पंचायत का फ़ैसला न मानने वालों के लिए एक ख़ास तरह के ज़ुर्माने की प्रथा है. इसके मुताबिक किसी भी व्यक्ति को न तो कुछ लेना होता है और न देना होता है पर उसपर ज़ुर्माना हमेशा के लिए बहीखाते में दर्ज रहता है.

यह ज़ुर्माना कभी भी ख़त्म नहीं होता और एक कलंक की तरह व्यक्ति के नाम के साथ जुड़ा रहता है.

पर क्या जातीय पंचायतों के स्तर पर किए गए फ़ैसलों का मान्यता देना उचित है, इस मसले पर उनका कहना है कि बुज़ुर्गों के अनुभवों की समाज को हमेशा ज़रूरत रहती है और पंचायत इसका एक माध्यम है.

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