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पाकिस्तान में ऐसे मनाई गई रामनवमी | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
मुल्तान में गर्मी बढ़ रही है और मंगलवार को तो क्रिकेट मैच के बाद भी कुछ विवादास्पद फ़ैसलों को लेकर पाकिस्तानी खेमे में तापमान काफ़ी चढ़ा हुआ था. दिन का खेल ख़त्म होने के बाद जब अपने होटल के लिए रवाना हुआ तो रास्ते में टैक्सी ड्राइवर ने दाहिनी ओर इशारा करके कहा, "साहब, यहाँ हिंदू लोग रहते हैं और आज उनका कोई त्यौहार है." मैंने टैक्सी रुकवाई और उस बस्ती की तरफ़ हो लिया. सामने ही वाल्मीकि मंदिर था. दरवाज़े पर बैठे एक सज्जन ने हमसे जूते उतारने को कहा. लगभग दो सौ लोग मंदिर में आरती गा रहे थे. मंदिर के पुजारी मुझे मूर्तियों के पास ले गए. मेरा नाम-गाँव पूछा और आरती में शामिल होने का आग्रह किया. वहाँ का माहौल देखकर एक पल के लिए भी मुझे ऐसा नहीं लगा कि मैं एक इस्लामी गणराज्य में हूँ. इतना ही नहीं हैरानी यह देखकर भी हुई कि आसपास के बहुत से मुसलमान भाई भी रामनवमी की पूजा में शिरकत कर रहे थे. पूजा अर्चना और प्रसाद वितरण के बाद मुझे हिंदू समुदाय के लोगों से बात करने का मौक़ा मिला.
पहले तो उनके नाम सुनकर ही एक मिश्रित संस्कृति का आभास हो जाता है जिसने अपनी पहचान को सुरक्षित रखते हुए आपसी प्यार और सदभाव में जीवन का आनंद लेना सीखा है. परवेज़ नाथ, हुसैनी लाल, तारिक़ घनश्याम वग़ैरा-वग़ैरा. क़रीब चार सौ हिंदू परिवार देश विभाजन से पहले से ही मुल्तान में रहते आए हैं. भारत से उनका कोई ख़ास संबंध नहीं है. रिश्ते-नाते सब पाकिस्तान में ही हैं. होली, दीवाली, शिवरात्रि, रामनवमी और सारे त्यौहार धूमधाम से मनाए जाते हैं. त्यौहारों के मौक़े पर हर समुदाय के लोगों को न्यौता दिया जाता है. जिनसे भी मेरी बात हुई, सबका यही कहना था कि उन पर किसी तरह की कोई पाबंदी नहीं है, ना ही किसी तरह की असुरक्षा की कोई भावना है. चिंता भी है एक स्वर में सबने बस यही कहा कि अगर भारत में धार्मिक उन्माद के कारण मुसलमानों को कोई नुक़सान पहुँचता है तो हमारे दिलों की धड़कन तेज़ होने लगती है.
डबडबाई आँखों से परवेज़ नाथ ने एक मिसाल दी. छह दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद के ढहाए जाने के बाद, सात दिसंबर को एक ज़ज़्बाती जुलूस प्राचीन प्रहलादपुरी मंदिर के पास पहुँचा और मंदिर के ऊपरी हिस्सों को तोड़कर गिरा दिया. मंदिर की चारदीवारी और छत भी गिरा दी लेकिन किसी हिंदू को किसी भी मुसलमान ने व्यक्तिगत तौर पर कोई नुक़सान नहीं पहुँचाया. उस दौरान भी सारे हिंदू परिवार सामान्य रूप से अपने कामकाज में लगे रहे और उनके कारोबार को कोई नुक़सान नहीं हुआ. रात काफ़ी हो चली थी, अगले दिन मुझे सुबह फिर स्टेडियम पहुँचना था. रामनवमी का प्रसाद और भंडारे का खाना खाकर होटल लौटा. सिंधु के तट पर बसा यह शहर मुल्तान इतिहास के पहिए पर सवारी कराता हुआ उस अतीत का अहसास दिला जाता है जो प्रेम, सदभाव और सहनशीलता के लिए उपमहाद्वीप को विश्व सभ्यता के शिखर पर ले गया था. |
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