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मुल्तान की मेहमाननवाज़ी! | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
लाहौर से जैसे बारात विदा हुई. तिरंगे झंडों से सजी गाड़ियाँ हवाई अड्डे की तरफ सरपट भागती जा रही थी. मैं मुल्तान की फ़्लाइट लेने जा रहा था. हवाई अड्डे पर नम आँखों से मेहमानों को विदा कर रहे थे वो अनजान चेहरे जिनकी मेहमाननवाज़ी का वर्णन शब्दों में कर पाना कठिन है. चायवालों से लेकर सामान उठाने वालों तक- सबके सब यही कह रहे थे कि हमारे भाइयों को जाकर हमारा पैगाम देना वो हमारे बड़े भाई हैं, हमें याद करते रहें. मैं मुल्तान जा रहे विमान की ओर बढ़ा. पता चला भारतीय टीम भी उसी विमान से मुल्तान जा रही है. लेकिन अपने कप्तान के बिना. सौरभ को लाहौर में ही पीठ की दर्द के कारण रुकना पड़ा था. मुल्तान पहुँचकर कुछ-कुछ वैसा ही लगा जैसे दिल्ली से अंबाला पहुँचने पर लगता है. छोटा सा हवाई अड्डा और यात्रियों से ज़्यादा बड़ी संख्या में सुरक्षाकर्मी. हवाई अड्डे के पास ही है कैंट का इलाक़ा. आवभागत टैक्सी में बैठते ही आवभागत शुरू हो गई. जनाब, मुल्तान में हम आपको कोई तकलीफ़ नहीं होने देंगे.
यह शहर तो आपकी दिल्ली जाने वालों के रास्ते का शहर है. अभी आपको दिल्ली गेट दिखाता हूँ. कपास और आमों का शहर! रेगिस्तान से जुड़ा शहर और आम के बाग? जी, जनाब हमारे आम से बेहरत आम आपको कहीं नहीं मिलेंगे. सूती कपड़े भी अपने घरवालों के लिए ले जाइएगा इतने सस्ते कहीं नहीं मिलेंगे. जुमे के रोज़ बाज़ार बंद हैं. लेकिन एक बाज़ार लगा है. चिड़ियों का बाज़ार. लोग चिड़ियाँ ख़रीद रहे हैं खाने के लिए नहीं उन्हें आज़ाद करके पुण्य कमाने के लिए या फिर दाना खिलाने के लिए. शहर से लगभग 18 किलोमीटर दूर है क्रिकेट स्टेडियम. दोनों टीमें अभ्यास के लिए स्टेडियम पहुँच चुकी हैं और मुझे भी पहुँचना है. मौक़ा मिला तो ज़रूर देखूँगा हुसैन अगाही बाज़ार, हनु का छज्जा और प्रह्लाद का मंदिर. |
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