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क्रिकेट ने दिखाया ननकाना साहब | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
लाहौर से क़रीब 75 किलोमीटर दूर शेखपुरा ज़िले में एक छोटा सा क़स्बा है ननकाना साहब - यही है सिख पंथ के संस्थापक गुरूनानक का जन्म स्थान. महाराजा रणजीत सिंह ने इसी ज़मीन पर एक विशाल गुरूद्वारा बनवाया था. सिख धर्म के अनुयायी दुनिया भर से इस गुरूद्वारे में दर्शन के लिए आते हैं. लेकिन विभाजन के बाद भारत में रहने वाले सिखों के लिए ननकाना साहब के दर्शन कर पाना उतना आसान नहीं रहा है. पीले रंग में रंगा गुरूद्वारा और विशाल परिसर जिसमें हैं सराय, लंगर हॉल और सेवादारों के कमरे. बहुत भीड़ तो नहीं थी लेकिन लगभग सौ लोग अर्चना के लिए जमा थे. गुरबानी गाने वाले हारमोनियम तबला लिए मग्न होकर गुरू की महिमा का गान कर रहे थे और हारमोनियम पर पड़े रुपयों को देखकर लगा कि वहाँ जमा लोगों में से कई भारत से आए थे. मैच के बहाने मेरे पास ही बैठे थे भारतीय पंजाब के फिल्लौर से आए सरदार कुलवंत सिंह. सतश्री अकाल करने के बाद सबसे पहला सवाल उन्होंने पूछा - आप भारत से आए हैं?
मैंने जैसे ही हाँ कहा उन्होंने मुझे गले लगा लिया. चेहरे पर ख़ुशी और आँखों के आँसू लिए बोले, "जीवन सफल हो गया. इस पवित्र धरती पर मत्था टेकने के लिए वर्षों से इंतज़ार कर रहा था." "मैच देखने के लिए वीज़ा मिला और गुरू की धरती ने बुला लिया." गुरूद्वारे के बरामदे में देखते ही देखते क़रीब 30-40 लोग जमा हो गए. लंबी दाढ़ी, नीली पगड़ी वाले एक सज्जन पास आए, अपना परिचय दिया - हेड ग्रंथी प्रेम सिंह. प्रेम सिंह ने बताया कि उनका जन्म ननकाना साहब में ही हुआ था. उनके साथ थे ग्रंथी बलवंत सिंह, बड़े गर्व से बोले, "हम पाकिस्तानी नागरिक हैं, यहीं रहते हैं, हर तरह की मज़हबी आज़ादी है.
"यह जो भीड़ आप यहीँ देख रहे हैं, हमारी और आपकी सरकारों के बीच बेहतर संबंधों की वजह से है." क़रीब छह हज़ार भारतीयों ने ननकाना साहब की यात्रा की है जिनमें से ज़्यादातर क्रिकेट देखने के बहाने आए थे. भारत से आए तीर्थयात्री भी सुधरते संबंधों की बात करते हुए भावुक हो जाते हैं. एक स्वर में गूँजती है आवाज़ें - "वीज़ा पर लगे प्रतिबंध हटने चाहिए, बॉर्डर खोल दो, आना-जाना फ्री कर दो, लड़ाई कोई नहीं चाहता, सब अमन और मोहब्बत से रहना चाहते हैं." बैसाखी मेले की तैयारियाँ चल रही थीं. सिखों के बड़े जत्थे भारत से आए. लाहौर से चलकर रावलपिंडी पहुँचा तो किसी ने कहा, "पंजा साहब ज़रूर जाइए." माना जाता है कि पंजा साहब में एक पत्थर पर गुरूनानक देव के पंजे के निशान हैं. मैं रावलपिंडी से लगभग 40 किलोमीटर दूर हसन अब्दाल क़स्बे में स्थित पंजा साहब के गुरूद्वारे में भी पहुँच गया. ग्रंथी रणजीत सिंह से मुलाक़ात हुई. रणजीत सिंह ने बताया कि पहले पाँच या दस लोग आते थे, अब सैकड़ों की संख्या में लोग अरदास के लिए आ रहे हैं. भारत-पाकिस्तान के बीच संधरते संबंध, क्रिकेट मैच और सैफ़ खेलों ने आशा की किरण दिखाई है. बैसाखी के मौक़े पर भारत से भी बहुत से तीर्थ यात्री पंजा साहब पहुँचे. |
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