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उपेक्षित है हड़प्पा की धरोहर | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
चहार चीज़ अस्त तोहफ़ा-ए-मुल्तान, गर्दो-गर्मा गदा ओ गोरिस्तान! फ़ारसी की यह पुरानी कहावत अपनी जगह है लेकिन मुल्तान ने भारतीय टीम को जो तोहफ़ा दिया और भारत से आए लोगों को जो प्यार और मोहब्बत का पैगाम दिया, उसे इतिहास के पन्नों से मिटा पाना शायद कभी संभव नहीं होगा. जो धूल, गर्मी, भिखारी और कब्रों के लिए जाना जाता था, उस मुल्तान ने भरी हुई आँखों से दिल जीतकर भारतवासियों को अलविदा कहा. होडल से मुल्तान आकर बसे मुसर्रत भाई(मुसर्रत हुसैन कुरैशी) से मुल्तान में ही पहली बार मुलाक़ात हुई. वे शाकाहारी खाने के लिए होटल के बैरे के साथ मेरे सवाल-जवाब को पास की कुर्सी पर बैठे बड़े ध्यान से सुनते रहे. थोड़ी देर बाद उठकर पास आ गए, और फिर हम दोनों ऐसे मिले जैसे बरसों से बिछुड़े भाई हों. सभ्यता की अमूल्य धरोहर मुसर्रत भाई के साथ हम कार से लाहौर के लिए रवाना हुए. रास्ते में खानेवाल, मियाँ चुन्नु, चीचावतनी होते हुए हम हड़प्पा पहुँचे. भारतीय उपमहाद्वीप में सभ्यता का एक महत्वपूर्ण नगर, उत्खनन से निकले भग्नावशेष और मिट्टी के ऊँचे टीले पर बना संग्रहालय.
प्राचीन भारतीय इतिहास के इस विद्यार्थी के रोमांच और ख़ुशी की कल्पना भी शायद आप नहीं कर पाएँ. ईंटें लगभग पाँच हज़ार साल पुरानी- लगता है जैसे 50-60 साल पुरानी हैं. जीवाष्मों के चिन्ह, सीपों के टुकड़े, टूटे हुए मिट्टी के बर्तन, मुहरें, चूड़ियाँ वगैरह-वगैरह. नगर व्यवस्था, आधुनिक शहरों के समान, जल निकासी का सुनियोजित प्रबंधन, शिल्पकारों के लिए बनाए गए चबूतरे और अन्न का भंडार या गोदाम. लेकिन 100 हेक्टेयर में फैले इस इलाक़े में मुझे अचानक लाल रंग की चमचमाती दो मोटरसाइकिलें दिखाई पड़ीं और उन पर सवार नौजवान भी. पहले तो लगा कि शायद इस ऐतिहासिक स्थल की देखरेख में लगे लोग हैं, लेकिन नहीं- यहाँ तो नए हड़प्पा शहर के लोग बेरोकटोक आ-जा सकते हैं. कोई सुरक्षाकर्मी?- हाँ-हाँ, छह-सात हैं. सौ हेक्टेयर में फैली इस ऐतिहासिक धरोहर की हिफ़ाजत के लिए केवल छह या सात लोग वो भी सादे कपड़ों में बिना हथियार या लाठी के. हड़प्पा संग्रहालय के क्यूरेटर मोहम्मद इसहाक भी इसे लेकर काफ़ी परेशान दिखे. उन्होंने इस बात की सिफ़ारिश की है कि हड़प्पा के भग्नावशेष वाले इस पूरे इलाक़े को घेरा जाए. आपको शायद यह पता हो कि प्राचीन काल में इस नगर की किलेबंदी के लिए चहारदिवारी बनी थी. अफ़सोस हुआ यह देखकर कि यह अमूल्य धरोहर सुरक्षित नहीं है. सभ्यता के उदय की इस निशानी की यादें सँजोए मैं लाहौर के लिए रवाना हुआ. वाघा की सच्चाई
हड़प्पा से लाहौर की तरफ़ बढ़ा तो साहीवाल शहर पहुँचा जिसे पहले मौन्टगोमरी के नाम से जाना जाता था. यहीं से एक सड़क पाकपतन जाती है जिसका पुराना नाम अजोधन था, जहाँ हजरत निज़ामुद्दीन औलिया के गुरू बाबा फ़रीद का मज़ार है. साहीवाल होता हुआ लाहौर पहुँचा. थोड़ी दूर आगे जाने पर अमृतसर पहुँच जाता. लेकिन अमृतसर से 17 मील पहले ही है वह सीमा रेखा जो 1947 के पहले नहीं थी. वाघा बॉर्डर- इस पार को उस पार से अलग करने वाली सरहद. एक वास्तविकता जिसे सांस्कृतिक समानता आज भी झुठला रही है. |
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