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एलटीटीई के हमले पर भारत की चिंता | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
श्रीलंका में तमिल विद्रोहियों के अभियानों में हवाई आतंक का ख़तरनाक आयाम भी जुड़ गया है. पिछले दिनों कोलंबो में वायु सेना के एक ठिकाने पर हमला कर लिबरेशन टाइगर्स ऑफ़ तमिल इलम (एलटीटीई) ने न सिर्फ़ श्रीलंका की चिंता बढ़ाई है बल्कि भारत को भी सचेत रहने के लिए मज़बूर कर दिया है. दक्षिणी राज्यों में भारत के परमाणु केंद्र और अंतरिक्ष केंद्र स्थित हैं. क्या ये हवाई हमला एलटीटीई की बढ़ती ताक़त का प्रतीक है या सिर्फ़ प्रचार भर है? 27 साल पहले 1983 में एलटीटीई सुप्रीमो वेल्लुपिल्लई प्रभाकरन जाफ़ना विश्वविद्यालय के पास उस जगह का मुआयना करने साइकिल पर गए थे जहाँ से उन्हें श्रीलंकाई सैनिकों पर घात लगाकर हमला बोलना था. 27 साल बाद इसी व्यक्ति ने दो छोटे जहाज़ों को 'स्टील्थ बॉम्बर' का रूप देकर श्रीलंका की राजधानी कोलंबो भेजा जिन्होंने वहाँ के हवाई ठिकाने को न केवल अपना निशाना बनाया बल्कि रात के अंधेरे में अपने ठिकाने पर भी लौट आए. एलटीटीई की त़ाकत क्या इसका मतलब ये लगाया जाए कि तमिल टाइगरों के पास एक अच्छी ख़ासी वायु शक्ति आ जाएगी और वो इसका इस्तेमाल बड़े पैमाने पर कर पाएंगे. एलटीटीई से जुड़े मामलों और प्रभाकरन की जीवनी लिखने वाले एमआर नारायणस्वामी कहते हैं,"बड़े पैमाने पर हवाई ताक़त का तो वो शायद इस्तेमाल न कर पाएंगे. मैं नहीं समझता कि उनके पास बहुत बड़ी वायुसेना है. लेकिन ये उनके लिए बहुत बड़ी मनोवैज्ञानिक जीत है." उन्होंने कहा,"ये कार्रवाई एलटीटीई के लिए रणनीतिक तौर पर इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इन्होंने इससे एक संदेश दिया है कि वो श्रीलंका में किसी भी जगह पर अब हमला कर सकते हैं." दूसरी तरफ़ कुछ लोगों का यह भी मानना है कि इन हमलों का कोई बड़ा मतलब नहीं लगाया जाना चाहिए क्योंकि एक-दो ज़हाज़ किसी भी देश की वायुसेना का बड़ा नुकसान नहीं कर सकते. लेकिन ये हमला सांकेतिक हैं और जिसके दूरगामी परिणाम हो सकते हैं. हमले के मायने श्रीलंका में भारतीय शांति सेना का नेतृत्व करने वाले जनरल एजे कलकट की राय है,‘‘एलटीटीई के इस हवाई हमले के दो मतलब निकाले जा सकते हैं. ये हमला प्रतीकात्मक भी हो सकता है और भविष्य के लिए बड़ा ख़तरा भी. उन्होंने संदेश दिया है कि अभी हम ख़त्म नहीं हुए हैं और कभी भी हमला कर सकते हैं." उन्होंने चेताते हुए कहा,"एक आतंकवादी संगठन के हाथ में अगर हवाई जहाज़ आ जाए तो एक हज़ार किलोमीटर के दाएँ-बाएँ कहीं भी ख़तरा पैदा हो सकता है.’’ अब सवाल ये उठता है कि तमिल टाइगरों को ये जहाज़ कहाँ से मिला? जहाज़ उड़ाने के लिए उन्हें ईधन कहाँ से मिला? विमान-चालकों ने प्रशिक्षण कहाँ से लिया? श्रीलंका वायुसेना के लगातार हमलों के बावज़ूद उनकी एकमात्र हवाई पट्टी पर इतनी ज़ल्दी मरम्मत कैसे कर ली गई. एमआर नारायणस्वामी कहते हैं,"एलटीटीई की बात करते समय हमें सबसे पहले एक बात ध्यान रखनी चाहिए कि उनके शब्दकोश में 'असंभव' नाम का कोई शब्द नहीं है. जो लोग एक बहुत बड़े पड़ोसी देश के भूतपूर्व प्रधानमंत्री का क़त्ल कर सकते हैं तो वो कुछ भी कर सकते हैं." एलटीटीई को जो पढ़ते आ रहे हैं उन्हें यह भी साफ़ पता है कि इनके दिमाग में एक सपना था कि हम किसी न किसी दिन अपनी एक नौसेना बनाएंगे चाहे लोग इसका मजाक उड़ाएँ और एक न एक दिन हमारे पास हवाई बेड़ा भी होगा. क़रीब सात साल पहले 1998 नवंबर में इन्होंने अपने हवाई जहाज़ का इस्तेमाल करके मुल्लाइतिगु ज़िले में एक कार्यक्रम किया था. उस कार्यक्रम में उन्होंने हवाई जहाज़ से वहाँ के लोगों के ऊपर और एलटीटीई के समर्थकों पर गुलाब के फूलों की वर्षा की थे. सुरक्षा
एक सवाल ये भी उठाया गया कि भारत द्वारा श्रीलंका को दिए गए सूर्य राडारों ने काम नहीं किया जिसका कि भारत के विदेश सचिव शिवशंकर मेनन ने खंडन भी किया. जब इस संबंध में हमने श्रीलंका में भारत के पूर्व उच्चायुक्त एनएन झा से बात की तो उन्होंने राडार न काम करने की बात को ग़लत ठहराते हुए श्रीलंकाई वायुसेना की क्षमता पर भी कुछ सवाल उठा दिए. उन्होंने कहा,‘‘अख़बारों ने शायद श्रीलंका में प्रचार किया है कि भारत ने कोलंबो हवाई अड्डे के लिए जो राडार दिया था उसने अच्छी तरह काम नहीं किया. मैं दो बातें बताना चाहता हूँ. राडार उस वक़्त सर्विस हो रहा था." दूसरी बात ये कि टी टॉप लेबल से हवाई जहाज़ आए और हमला किया जहाँ कोई राडार पकड़ नहीं सकता है. असल में श्रीलंका सरकार को इस पर सोचना चाहिए कि उनको अपने बेस से उड़कर कोलंबो एयर पोर्ट पर हमला करने में दो घंटे लग गए और वापस फ़िर दो घंटे लगे. एनएन झा कहते हैं, "लगभग चार घंटे वो हवाई जहाज उड़ रहे थे उनको कहीं रोका नहीं गया. श्रीलंकाई वायु सेना के पनाली और त्रिंकोमाली में बेस हैं. ववुनिया में जो बेस है वह एलटीटीई के ठिकानों के बिल्कुल बगल में है.’’ ज़ाहिर है इस तरह के हमले के लिए तमिल टाइगरों ने ख़ासा अभ्यास किया होगा तो इस पर श्रीलंका और भारत को खुफ़िया एजेंसियों की नज़र क्यों नहीं पड़ी.
नारायणस्वामी कहते हैं कि ये कहना ग़लत है कि एलटीटीई के पास विमान होने की जानकारी किसी के पास नहीं थी,‘‘ऐसी बात नहीं है कि ये उनको या किसी और को पता नहीं था. दो साल पहले भारत के तत्कालीन विदेश मंत्री नटवर सिंह ने सार्वजनिक तौर पर कहा था कि भारत को पता है कि उनके पास हवाई जहाज़ है." वो बताते हैं कि कई सालों से श्रीलंकाई नौसैना के लोग अपने कमांडरों से कहते आ रहे हैं कि जब हमारे जहाज़ समुद्र में उत्तर-पूर्व के तट पर चलते हैं तो हमारे राडार में कुछ डॉट्स(बिलिप्स) आते हैं और गायब हो जाते हैं. तो लोगों को पता था कि वे वहां पर अभ्यास कर रहे हैं वे कहीं न कहीं जहाज को उड़ा रहे हैं. उन्होंने कहा,"लेकिन ये मानना पड़ेगा कि एलटीटीई की वहाँ जीत हुई है. पूरी दुनिया को पता था कि उसके पास वो चीज़ है इसके बावज़ूद बहुत बढ़िया तरीके से छुपा रखा और अपनी सम्पत्ति को ख़राब नहीं होने दिया और रातोंरात हमला किया. भारत सरकार ने जो राडार श्रीलंका सरकार को दिया था शायद वो रविवार को उसकी सर्विसिंग करने के लिए बंद करते थे और हमला उन्होंने रविवार रात को किया.’’ भारत और श्रीलंका के सुरक्षा संबंध कुछ इस तरह के हैं कि भारत बड़े हथियार श्रीलंका को दे पाने की स्थिति में नहीं है क्योंकि तमिलनाडु का जनमत इसके पक्ष में नहीं है. समीक्षा बदली परिस्थितियों में भारत-श्रीलंका सुरक्षा संबंधों की समीक्षा पर श्रीलंका में भारतीय शांति सेना के प्रमुख रहे जनरल एजे कलकट ने कहा,‘‘श्रीलंका से संबंध अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हैं जिसमें तस्करी और आंतकवाद के ख़िलाफ़ मुहिम में श्रीलंका ही नहीं दुनिया के सभी देश हमारे साथ हैं." वो कहते हैं, "दूसरा हमारा श्रीलंका से अपना पुराना संबंध भी है. उनके अधिकारियों को हम यहाँ प्रशिक्षण देते हैं. उनके अधिकारी यहाँ कोर्स करते हैं. उन्हें हथियार वगैरह देने का कोई ताल्लुक़ इस बात नहीं है. श्रीलंका को हम हथियार नहीं देते तो दूसरे देश के लोग देते हैं" दक्षिण में भारत का न सिर्फ़ एक परमाणु केंद्र बल्कि अंतरिक्ष केंद्र भी है. तो क्या इस हमले से भारत को चिंतित होना चाहिए. नारायणस्वामी का मानना है कि भारत को सावधान रहने की ज़रूरत है इसलिए नहीं कि एलटीटीई भारत के किसी ठिकाने को अपना निशाना बना सकता है बल्कि इसलिए कि भारत में मौज़ूद दूसरे आतंकी संगठन इससे प्रेरणा ले सकते हैं. उन्होंने कहा,‘‘आज की तारीख़ में एलटीटीई हिंदुस्तान से पंगा लेना नहीं चाहेगा. 15-16 साल पहले पंगा लिया और इसका ख़ामियाज़ा वे आज भी भुगत रहे हैं और ये एलटीटीई और उनके समर्थकों को भी मालूम है. लेकिन जो ख़तरे वाली बात यह है कि एलटीटीई ने जो किया उसको देखकर हिंदुस्तान के कई हिंसक समूह भी सोचने लग जाएंगे कि अगर ये कर सकते हैं तो हम क्यों नहीं. लेकिन मैं व्यक्तिगत स्तर पर समझता हूँ कि भारत में कोई ऐसा समूह नहीं है जिसके पास एलटीटीई के पांच प्रतिशत के बराबर की क्षमता है." विश्लेषकों का मानना है कि इस हमले के बावज़ूद ये कहना शायद ग़लत नहीं होगा कि तमिल टाइगरों में अब शायद वो ताक़त नहीं रही जो पहले हुआ करती थी. हो सकता है कि ये हमला चौंकाने या प्रचार पाने के लिए किया गया हो लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि भारतीय वायु सेना और नौसेना को चौकन्ना नहीं रहना चाहिए क्योंकि एलटीटीई इस तरह के अस्वाभाविक फ़ैसले लेने के लिए मशहूर रहा है. | इससे जुड़ी ख़बरें '14 तमिल विद्रोहियों के शव मिले'11 मार्च, 2007 | भारत और पड़ोस सेना-तमिल विद्रोही संघर्ष, 11 मरे21 मार्च, 2007 | भारत और पड़ोस श्रीलंका में आत्मघाती हमला, छह मरे27 मार्च, 2007 | भारत और पड़ोस तमिल विद्रोहियों ने किया हवाई हमला25 मार्च, 2007 | भारत और पड़ोस श्रीलंका में बढ़ रही लड़ाई से भारत चिंतित28 मार्च, 2007 | भारत और पड़ोस श्रीलंका में '15 तमिल विद्रोही मारे गए'29 मार्च, 2007 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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