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रविवार, 01 अप्रैल, 2007 को 12:19 GMT तक के समाचार
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चुनावी बिसात पर जातीय गोलबंदी

ग्रामीण
उत्तर प्रदेश में जातिगत समीकरण चुनावों में बहुत असरदार साबित होता आया है
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों की बिसात पर एक बार फिर जातीय गोलबंदी और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के बीच राजनीतिक मुक़ाबला होने जा रहा है.

हालाँकि नाम के लिए विकास और क़ानून व्यवस्था भी चुनाव में मुद्दे हैं, लेकिन सभी दलों को अपने-अपने जातीय समीकरणों पर ही ज़्यादा भरोसा है.

सत्तारुढ़ समाजवादी पार्टी (सपा) को अगर अपने यादव-मुस्लिम गठजोड़ के साथ राजपूत और कुछ अन्य पिछड़ी जातियों के जुड़े रहने के भरोसे सरकार में वापसी की उम्मीद है तो बहुजन राजनीति को सर्वजन सुखाय में बदलकर मायावती की बसपा दलितों, मुसलमानों और अति पिछड़ों के साथ ब्राह्मणों को जोड़कर बहुमत पाने की जुगत में है.

हिंदुत्व कार्ड

भाजपा दबे पाँव हिंदुत्व कार्ड खेलते हुए अपने खोए सवर्ण जनाधार को एकजुट करने की कोशिश में है.

वह कल्याण सिंह, जद-यू के शरद यादव और सोनेलाल पटेल के अपना दल के सहारे लोध, कुर्मी और अन्य पिछड़ी जातियों को जोड़कर सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरने का सपना संजो रही है.

काँग्रेस के पीछे हालाँकि किसी जातीय गोलबंदी की ताकत नहीं है, लेकिन उसकी कोशिश मुसलमानों के साथ-साथ शहरी और सवर्ण मतदाताओं को जोड़ने की है.

इसके अलावा विश्वनाथ प्रताप सिंह और राज बब्बर के जनमोर्चा, अजित सिंह के राष्ट्रीय लोक दल के साथ रामविलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी, उदित राज की इंडियन जस्टिस पार्टी समेत मुस्लिम वोटों की इजारेदारी का दावा करने वाले यूडीएफ और नेशनल लोकतांत्रिक पार्टी जैसे कई छोटे दल भी जातीय और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के सहारे चुनावी वैतरणी पार करने की कोशिश में हैं.

सामाजिक ध्रुवीकरण

कुल मिलाकर भारत के सबसे बड़े राज्य का चुनाव इस बार फिर सामाजिक ध्रुवीकरण का ही महाभारत बनता जा रहा है.

उत्तरप्रदेश की सामाजिक राजनीति का यर्थात यह है कि यहाँ अलग-अलग सामाजिक वर्गों की राजनीतिक प्रवृत्ति भी अलग-अलग है.

मसलन सवर्ण हिंदुओं में ब्राह्मणों ने हमेशा स्थानीय स्तर पर जातीय उम्मीदवार की बजाय उस पार्टी को तरजीह दी जिसे वह अपनी पार्टी मानते हैं.

पहले काँग्रेस और बाद में भाजपा के साथ उनका जुड़ाव ऐसा ही रहा है. लेकिन राजपूतों को पार्टी से ज़्यादा स्थानीय स्तर पर सजातीय उम्मीदवार ज़्यादा भाते रहे हैं.

पिछड़ों में यादवों और जाटों का राजनीतिक चरित्र ब्राह्मणों जैसा रहा है जबकि कुर्मियों और गूजरों का रवैया राजपूतों जैसा रहा है.

दलितों में जाटव भी एकमुश्त पार्टी के साथ जुड़ते रहे हैं, जबकि वाल्मीकि, सोनकर और पासी आदि जातियाँ सजातीय उम्मीदवारों को ज़्यादा तरजीह देती रही हैं.

मुसलमानों की पहली प्राथमिकता भाजपा को हरा सकने वाले उम्मीदवार को चुनने की रही है और इसमें पहले काँग्रेस और बाद में मुलायम सिंह यादव बाज़ी मारते रहे हैं.

लेकिन जहाँ बसपा ने मजबूत मुस्लिम उम्मीदवार दिया, वहाँ मुसलमानों का बहुमत बसपा के साथ भी रहा है.

धमाचौकड़ी

इस पूरी जातीय और सांप्रदायिक सियासी धमाचौकड़ी में राज्य की क़ानून व्यवस्था, विकास, भ्रष्टाचार जैसे मुद्दे सिर्फ़ मीडिया और बहसों तक ही सीमित होकर रह गए हैं.

मुलायम के जनाधार के लिए राज्य में क़ानून व्यवस्था कोई मुद्दा नहीं है तो मायावती के जनाधार के लिए उन पर चल रहे ताज कोरिडोर जैसे मामले कुछ मायने नहीं रखते हैं.

भाजपा और काँग्रेस को इसका खामियाजा ज़रूर उठाना पड़ता है क्योंकि उनका मतदाता वर्ग जल्दी नाराज होने वाला है.

लेकिन राज्य की सामाजिक गोलबंदी की राजनीति भी अब नए दौर में पहुँच गई है.

एक समय चौधरी चरण सिंह की अगुआई में पूरब से पश्चिम तक सारी की सारी जातियाँ (जाट,गूजर, यादव, कुर्मी, लोध, मुस्लिम) सभी एकजुट थीं.

लेकिन बाद में मुलायम सिंह यादवों के, कल्याण सिंह लोधों के, अजित सिंह जाटों के नेता होकर रह गए.

अब इसके बाद कुर्मियों में सोनेलाल पटेल, राजभरों में ओमप्रकाश राजभर जैसे नेता उभर आए हैं.

इसी तरह कभी काँग्रेस के झंडे तले सारे दलित एकजुट थे, लेकिन अब मायावती के पीछे दलितों का बहुमत है.

हालाँकि उदित राज, आरके चौधरी जैसे दलित नेताओं को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता.

सियासी महाभारत

मुसलमानों में भी कई गुट और नेता सामने आ रहे हैं यानी जातीय और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की राजनीति के भीतर भी अब खाँचें बन रहे हैं और उनमें भी बंटवारा है.

आश्चर्यजनक रूप से मंडलवादी और अंबेडकरवादी दोनों ही राज्य में 10 फ़ीसदी से ज़्यादा ब्राह्मणों, सात फ़ीसदी राजपूतों और इतने ही प्रतिशत वैश्यों को रिझाने में जुटे हुए हैं.

जातीय राजनीति का यह नया आयाम है. लेकिन शायद सूबे की जातीय राजनीति अब अंतिम दौर में हैं और उसका आखिरी सियासी महाभारत है.

सत्ता में हिस्सेदारी को लेकर पिछड़ी और दलित जातियों की आकांक्षाएँ अब तुष्ट होने के पड़ाव पर हैं, इसलिए अगले चुनाव तक जातियों की सीमाएँ कमजोर पड़ेंगी और लोग मुद्दों की ओर लौटेंगे.

किसानों की बर्बादी, खराब क़ानून व्यवस्था, महंगाई, राज्य में पिछड़ता विकास, शिक्षा और स्वास्थ्य की खस्ताहालत, बिजली संकट जैसे मुद्दे प्रभावी होंगे.

शायद इसीलिए काँग्रेस इस चुनाव को अगले चुनाव का रिहर्सल मानकर लड़ रही है, जबकि भाजपा की कोशिश फिर से राज्य की बड़ी ताकत बनकर केंद्र की ओर क़दम बढ़ाने की है.

मुलायम के लिए राज्य की राजनीति में यह चुनाव शायद आख़िरी पारी होगा और इसके बाद वह अपने पुत्र को स्थापित करने की पूरी कोशिश करेंगे.

मायावती चौथी बार मुख्यमंत्री बनकर वह सब करना चाहती हैं जो पिछली तीन बार नहीं कर सकीं, लेकिन राजनीतिक प्रतिशोध और सनक की सियासत भविष्य में उनका भी गणित बिगाड़ सकती है.

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