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मुस्लिम मतदाताओं को रिझाने की कोशिश | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनावों में मुस्लिम मतदाताओं को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए सभी राजनीतिक दलों ने अपने-अपने तरीक़े से प्रयास शुरू कर दिए हैं. प्रदेश के लगभग 17 प्रतिशत मुस्लिम मतदाता किसी भी राजनीतिक दल का भविष्य बनाने या बिगाड़ने में अहम भूमिका निभा सकते हैं. यह बात साफ़ है कि प्रदेश की 403 में से 100 से अधिक सीटों पर प्रभाव डालने वाले मुसलमान अपने-अपने क्षेत्रों में उसी उम्मीदवार की हिमायत करेंगे जो भाजपा के उम्मीदवार को परास्त करने में सक्षम दिखेगा. भाजपा की कोशिश इसके बावजूद भाजपा भी इन मतदाताओं में अपनी पैठ बनाने कोशिश में लगी है. पार्टी ने अपने एकमात्र मुसलमान लोकसभा सदस्य और पार्टी अल्पसंख्यक मोर्चा के प्रमुख शहनवाज़ हुसैन को आगे कर दिया है. पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने भी उनके साथ हरा साफ़ा और टोपी पहनकर जो तस्वीरें खिचवाई उन्हें तमाम समाचारपत्रों ने प्रमुखता से छापा. प्रदेश के अधिकाँश मुस्लिम मतदाताओं का ज़हन इस मामले में बिल्कुल साफ़ है कि वह भाजपा के विरोध में अपने मताधिकार का प्रयोग करेंगे. मुस्लिम रुख़ लेकिन मुसलमान किसी एक पार्टी के पक्ष में नहीं हैं. अलग-अलग ज़िलों और अलग-अलग विधानसभा क्षेत्रों में वह अलग-अलग पार्टी के ताक़तवर उम्मीदवार के पक्ष में हैं. समाजवादी पार्टी (सपा), बहुजन समाज पार्टी (बसपा), जनमोर्चा और काँग्रेस को अलग-अलग विधानसभा क्षेत्रों के मुसलमानों का समर्थन दिख रहा है. यह भी सही है कि सपा से कुछ मुसलमानों का मोह भंग हुआ है. इसके बावजूद बड़ी संख्या में मुसलमानों का समर्थन अब भी मुलायम सिंह को ही हासिल है. ऐसा लग रहा है कि विश्वनाथ प्रताप सिंह और राज बब्बर का जनमोर्चा जैसे-जैसे गति पकड़ेगा मुसलमानों की सपा से दूरी भी बढ़ेगी. शहरी रुझान शहरी क्षेत्रों के मुसलमानों का स्पष्ट रुझान काँग्रेस की ओर है. मध्य उत्तरप्रदेश के अलावा पूर्वी, पश्चिमी और बुंदेलखंड के मुसलमानों में बसपा की ओर झुकाव कुछ अधिक है. काँग्रेस सच्चर कमेटी की सिफ़ारिश, बसपा मुसलमानों के कल्याण की योजनाएँ, जनमोर्चा अपने नेता विश्वनाथ प्रताप सिंह के मुस्लिम प्रेम और सपा प्रमुख व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव अल्पसंख्यकों की सुरक्षा का पुराना नारा लिए चुनाव मैदान में उतर चुके हैं. इन सभी पार्टियों का प्रयास है कि अधिक से अधिक मुस्लिम मत उनकी झोली में आएँ. कुछ ज़िलों में मुसलमान खुलकर किसी न किसी पार्टी के साथ आ चुके हैं लेकिन अधिकांश मुसलमानों ने अपने इरादे अभी तक स्पष्ट नहीं किए हैं. मौलवियों का सहारा सपा ने कुछ मौलवियों को अपनी ओर ज़रूर कर लिया है, लेकिन इसका सकारात्मक प्रभाव नहीं दिख रहा है. मसलन मशहूर शिया आलिम मौलाना क़ल्बे जव्वाद ने पीडीएफ और दिल्ली की जामा मस्जिद के इमाम अहमद बुखारी ने यूडीएफ के नाम से मुसलमानों के अलग राजनीतिक संगठन बनाने की घोषणा की थी. शुरूआत में दोनों ने ही मुलायम सिंह सरकार पर मुस्लिम विरोधी होने का इल्ज़ाम लगाया था. लेकिन कुछ दिनों बाद पीडीएफ ने मुलायम सिंह और यूडीएफ ने जन मोर्चा के ओर नरम रुख़ अपना लिया कुल मिलाकर काँग्रेस, सपा, बसपा, जनमोर्चा और दूसरे छोटे क्षेत्रीय दल मुसलमानों को भाजपा का डर दिखाकर उनका मत हासिल करने की रणनीति पर चल रहे हैं. |
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