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'छोटे चौधरी' के गढ़ में काँटे का मुक़ाबला | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
उत्तर प्रदेश के ख़ुशहाल पश्चिमी इलाक़े में इस बार विधानसभा चुनावों में काँटे की टक्कर होने जा रही है. इन क्षेत्रों में सात, 13 और 18 अप्रैल को मतदान होगा. हरित क्राँति के असर के नाते पश्चिमी उत्तर प्रदेश का ग्रामीण इलाक़ा काफ़ी संपन्न और खेती बाड़ी में काफ़ी प्रगतिशील है. वहीं दिल्ली से सटे ज़िलों में तेज़ी से औद्योगिकीकरण और शहरीकरण हो रहा है. तेज़ बदलाव की बयार और शहरी मतदाताओं की संख्या में बढ़ोत्तरी से परंपरागत गणित भी प्रभावित हो रहा है. दिग्गज भाजपा नेता कल्याण सिंह, बसपा सुप्रीमो सुश्री मायावती, राष्ट्रीय लोक दल (रालोद) के मुखिया और छोटे चौधरी के नाम से जाने जानेवाले अजित सिंह तथा जनमोर्चा के अध्यक्ष राज बब्बर इसी अंचल से आते हैं. दिलचस्प मुक़ाबला यहाँ का चुनावी महाभारत भी इस बार कम दिलचस्प नहीं होने जा रहा है. पश्चिमी उत्तरप्रदेश में तमाम उतार-चढ़ाव के बाद भी राष्ट्रीय लोकदल के नेता अजित सिंह ही राजनीति की मुख्य धुरी और मजबूत क्षेत्रीय ताक़त बने हुए हैं. पर भाजपा का देहाती और शहरी इलाकों में दिख रहा उभार सभी दलों को परेशानी में डाल रहा है. पड़ोसी उत्तराखंड में भाजपा की विजय का असर इस इलाक़े के कार्यकर्ताओं और नेताओं के मनोबल पर साफ़ दिख रहा है. निकाय चुनावों में पश्चिमी उत्तरप्रदेश के सर्वोत्कृष्ट प्रदर्शन करके भाजपा ने पहले ही शहरी इलाक़ों में अपनी पैठ बहाली का प्रमाण दे दिया था. पूरे पश्चिमी इलाके में महँगाई और खेती-किसानी की बदहाली से लेकर निठारी और डॉ कविता कांड जैसे सवाल केंद्र में राज कर रही काँग्रेस और उत्तरप्रदेश पर काबिज सपा के लिए परेशानी खड़ी कर रहे हैं. किसान जागरण सभी जानते हैं कि इसी इलाके में 1987-88 के दिनों में विस्मयकारी किसान आंदोलन खड़ा हुआ था. इस के कारण गाँव-गाँव में किसान जागरण की छाप आसानी से देखी जा सकती है. यही नहीं पश्चिमी उत्तरप्रदेशों में जाटों के दबदबे वाली कई सीटें ऐसी भी हैं जहाँ लंबे समय तक दलित और कमजोर लोग वोट भी नहीं डाल पाते थे. पर अब ऐसा नहीं है. इन इलाकों में ही दलित संगठन के काम में लगी रहीं सुश्री मायावती को बसपा संस्थापक स्वर्गीय कांशीराम ने अपना उत्तराधिकारी बनाया और तीन बार उत्तरप्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया. यहाँ का दलित वोट मायावती के साथ न सिर्फ़ चट्टान की तरह खड़ा है, बल्कि मतदान केंद्रों तक बेफिक्र होकर जाता भी है. लेकिन पश्चिमी उत्तरप्रदेश में किसान वोटों को काफ़ी निर्णायक माना जाता है. पैठ राष्ट्रीय लोकदल के अध्यक्ष अजित सिंह अपने पिता स्व. चरण सिंह की किसानों के बीच गहरी पैठ और अनुराग के नाते अब भी किसानों के बीच अपना ख़ास असर रखते हैं. हालाँकि अजित सिंह के कई मौक़ों पर अलग-अलग दलों के साथ गठजोड़ करने के कारण उनके परंपरागत वोट टूटे भी हैं और अनेक दमदार जाट, गूजर और अल्पसंख्यक नेता उनसे किनारा करके अन्य दलों में चले गए. कैराना की सांसद अनुराधा चौधरी के रालोद पर वर्चस्व के कारण कार्यकर्ता दो खेमों में बंट गए हैं. मगर हरित प्रदेश के नारे तथा अजित सिंह के सुपुत्र जयंत सिंह के देहाती इलाकों में सक्रिय होने से उनको नया आधार भी मिला है. पश्चिमी उत्तरप्रदेश में 11 लोकसभा सीटें और 55 विधानसभा सीटें आती हैं. इन लोकसभा सीटों के परिधि में आने वाले ज़िले के आधार पर विधानसभा सीटों की संख्या 70 तक मानी जा सकती है. आगरा, मथुरा, अलीगढ़, फ़िरोजाबाद, बागपत, मुज़फ़्फरनगर, बुलंदशहर, बिजनौर, गाज़ियाबाद, मेरठ तथा सहारनपुर आदि ज़िले तेज़ी से विकसित हो रहे हैं. इन इलाकों में उपजाऊ ज़मीने कंक्रीट के जंगल में बदल रही हैं और तेज़ शहरीकरण हो रहा है. गाज़ियाबाद ज़िले में शहरी आबादी 55 फीसदी पार कर चुकी है, तो आगरा में यह करीब 44 फ़ीसदी हो गई है. मेरठ की शहरी आबादी भी करीब 49 और गौतमबुद्धनगर में करीब 37 फ़ीसदी हो गई है. केवल अजित सिंह का मजबूत किले बागपत में ही 80 फ़ीसदी से ज़्यादा देहाती आबादी अपना वर्चस्व बनाए हुए हैं. गन्ना, गेहूँ और धान यहाँ की मुख्य फसल है. पर नकदी फसल होने के कारण गन्ना अर्थव्यवस्था तथा राजनीति दोनों को प्रभावित करता है. बेचैनी वीपी सिंह तथा राज बब्बर ने दादरी परियोजना को लेकर जो माहौल बनाया उससे किसानों में उनकी पैठ बढ़ी है. उससे सबसे ज़्यादा बेचैनी सपा में है. वीपी सिहं इस तालमेल के सहारे मुलायम सिंह की विदाई सुनिश्चित करना चाहते हैं. पश्चिमी उत्तरप्रदेश अरसे तक लोकदल का मजबूत किला होता था. पर लोकदल घटकों में आपसी गलाकाट लड़ाई तथा ख़ासतौर पर अजित-मुलायम टकराव ने देहाती इलाकों में भाजपा को जड़े जमाने का मौक़ा दिया. 1998 के लोकसभा चुनाव में अजित सिंह बागपत जैसी अभेद्य सीट से भाजपा के सोमपाल के हाथों 44 हज़ार वोटों से पराजित हुए थे. इस दफा भाजपा के उभार से राजनीतिक दल आतंकित हैं. राजनाथ सिंह ने उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री और केंद्र में कृषि मंत्री रहने के दौरान ख़ासतौर पर इस इलाके में किसानों के बीच ख़ासी पक़ड़ बनाई. वहीं दूसरी ओर कल्याण सिंह ने 1991 के दिनों में इस अंचल में क़ानून व्यवस्था सुधारने के लिए काफ़ी कड़े फ़ैसले लिए थे. ये बातें आज भाजपा के पक्ष में जा रही हैं. रालोद 22 ज़िलों को मिलाकर हरित प्रदेश नाम से नया राज्य बनाने की भी लंबे समय से वकालत करता रहा है पर बाकी दल इस पर मौन रहे हैं. रालोद एक बार फिर इसे बड़ा मुद्दा बनाने की कोशिश में है. |
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