|
पूर्व मुजाहिदीन के समर्थन में प्रदर्शन | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
अफ़ग़ानिस्तान की राजधानी काबुल में हज़ारों लोगों ने मानवाधिकार हनन के आरोपों का सामना कर रहे पूर्व मुजाहिदीन कमांडरों को आम माफ़ी दिए जाने के समर्थन में प्रदर्शन किया. उधर, ब्रिटेन ने अफ़गानिस्तान में और सैनिक भेजने की बात कही है. काबुल के नेशनल स्टेडियम में लगभग 25 हज़ार लोगों ने पूर्व मुजाहिदीन कमांडरों के समर्थन में प्रदर्शन किया. मुजाहिदीन नेताओं के समर्थन में ज़ोरदार नारेबाजी की. प्रदर्शनकारियों ने माँग की कि इस विधेयक को क़ानून का दर्जा दे दिया जाए. प्रदर्शनकारियों में अनेक पूर्व मुजाहिदीन और अनेक सरकारी वरिष्ठ अधिकारी भी शामिल थे. पूर्व राष्ट्रपति बुरहानुद्दीन रब्बानी, मौजूदा उपराष्ट्रपति करीम ख़लीली और ऊर्जा मंत्री इस्माईल ख़ान भी प्रदर्शनकारियों में शामिल थे. इन मुजाहिदीन नेताओं ने 1980 के दशक में अफ़ग़ानिस्तान पर सोवियत संघ के क़ब्ज़े के दौरान सशस्त्र संघर्ष किया था और इसके बाद गृहयुद्ध में भी हिस्सा लिया था. ऐसे आरोप हैं कि यह वही समय था जब मुजाहिदीन गुटों ने हज़ारों आम नागरिकों की हत्या कर दी थी और इनके आपसी झगड़ों में अफ़ग़ानिस्तान का ज़्यादातर हिस्सा तबाह हो गया था और अकेले काबुल में ही लगभग अस्सी हज़ार लोग मारे गए थे. पूरे अफ़ग़ानिस्तान में दस लाख से ज़्यादा लोग मारे गए थे. इन मुजाहिदीन नेताओं पर मानवाधिकार हनन के आरोप हैं और इनमें से कई वर्तमान संसद के सदस्य हैं. अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों ने इन लोगों के ख़िलाफ़ मुक़दमा चलाने की माँग की है. पिछले सप्ताह ही अफ़ग़ानिस्तान की संसद के उच्च सदन ने 'अपराध माफ़ी' विधेयक को मंज़ूरी दी थी लेकिन राष्ट्रपति हामिद करज़ई के प्रवक्ता ने संकेत दिए थे कि राष्ट्रपति इस विधेयक को असंवैधानिक मानते हैं. निचले सदन ने जनवरी में ही इस विधेयक को मंज़ूरी दे दी थी. करज़ई इस विधेयक के विरोध करते रहे हैं. उन्होंने यह भी कहा है कि इस विधेयक को क़ानून बनने के लिए ज़रूरी मंज़ूरी देने से पहले वह क़ानूनी सलाह लेंगे. निचले सदन के कुछ सांसदों ने अब कहा है कि जब उन्होंने इस विधेयक को पारित कराने के समर्थन में मतदान किया था तो वह इसके क़ानून बनने के बाद के नतीजों को ठीक से नहीं समझ पाए थे. अगर यह विधेयक पारित होकर क़ानून बन जाता है तो उन लोगों पर युद्धापराध के मुक़दमे नहीं चलाए जा सकेंगे जिन्होंने 1980 के दशक में सोवियत संघ के ख़िलाफ़ लड़ाई में और फिर 1992-1996 तक चले गृहयुद्ध में हिस्सा लिया था. अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों और संयुक्त राष्ट्र ने ऐसे किसी भी प्रस्तावित क़ानून पर विरोध जताया है और कहा है कि न्यायिक प्रक्रिया पूरी होनी चाहिए. | इससे जुड़ी ख़बरें युद्ध अपराधियों को माफ़ी पर सहमति20 फ़रवरी, 2007 | भारत और पड़ोस आतंकवाद पर चर्चा करेंगे करज़ई16 फ़रवरी, 2007 | भारत और पड़ोस अफ़ग़ानिस्तान की हिंसा में कमी: करज़ई14 फ़रवरी, 2007 | भारत और पड़ोस तालेबान पर गेट्स और मुशर्रफ़ मिले12 फ़रवरी, 2007 | भारत और पड़ोस 'दाढ़ी बनाई तो ख़ैर नहीं'12 फ़रवरी, 2007 | भारत और पड़ोस 'हमले के मकसद से विद्रोहियों की घुसपैठ'11 फ़रवरी, 2007 | भारत और पड़ोस चार शरणार्थी शिविर अगस्त तक बंद होंगे08 फ़रवरी, 2007 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
| |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||