|
बीएमसी चुनावों के लिए मतदान | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
मुंबई महानगर पालिका (बीएमसी) की 227 सीटों और महाराष्ट्र राज्य के नौ अन्य नगर निकायों के लिए गुरुवार को मतदान हो रहा है. लोगों ने सुबह से ही घरों से निकलकर मतदान केंद्रों की ओर जाना शुरू कर दिया. इन चुनावों में आम लोगों के अलावा फ़िल्म जगत की कई हस्तियाँ भी मतदान करने पहुँचीं. इस बार के निकाय चुनावों में कई राजनीतिक समीकरण बदले हुए हैं और इस कारण कुछ भी स्पष्ट तौर पर कह पाना मुश्किल ही है कि किस पार्टी या गठबंधन को बीएमसी में बहुमत मिल सकेगा. राज्य में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) और कांग्रेस के गठबंधन की सरकार है पर पिछले महीने ही दो प्रमुख राजनीतिक दलों ने घोषणा की थी कि वे अलग-अलग चुनाव लड़ेंगे क्योंकि दोनों दलों के बीच सीटों के बँटवारे पर सहमति नहीं बन सकी. दूसरी ओर शिवसेना और भाजपा है पर ध्यान देने वाला पक्ष यह है कि राज ठाकरे के शिवसेना से अलग होने के बाद से राज्य में यह पहला चुनाव है और राज ठाकरे के पार्टी छोड़ने का नुक़सान शिवसेना को उठाना पड़ सकता है. जानकारों का मानना है कि इस बार के चुनावों में किसी को भी स्पष्ट जनादेश मिलने की संभावना कम ही है. बदलते समीकरण दरअसल राज ठाकरे ने अलग होने के बाद से जिस तरह की मेहनत लोगों के बीच जाकर की है उसका लाभ उनकी पार्टी को मिलेगा और यह वोटों की यह सेंध शिवसेना में लग सकती है. उधर एनसीपी भी बीएमसी में अपनी ताक़त बढ़ाने में लगी हुई है. कुछ लोगों का तो यहाँ तक मानना है कि राज ठाकरे और एनसीपी के बीच एक तरह का अघोषित तालमेल है, हालांकि उन्होंने इसकी कोई औपचारिक घोषणा या स्वीकारोक्ति नहीं की है. एक और पहलू यह भी है कि एनसीपी- कांग्रेस गठबंधन के अलग होने का लाभ शिवसेना को कम राज ठाकरे को ज़्यादा मिल सकता है क्योंकि इसका निचले स्तर पर ज़्यादा असर दिखाई नहीं देता है. ग़ौरतलब है कि वर्तमान महानगर पालिका में शिवसेना को बहुमत हासिल है जबकि कांग्रेस के 64 और एनसीपी के 14 सदस्य हैं. बदलो तस्वीर इस बार के चुनावों में बीएमसी के कामकाज, पिछले दिनों बारिश और बाढ़ के संकट से निपटने में पालिका का नाकामी, लोगों की दी जाने वाली सुविधाओं की लचर स्थिति और ब्रितानी शासनकाल से चले आ रहे नियम और संरचना को बदलने जैसे मुद्दों पर चर्चा हो रही है. कुछ नागरिक समूह इस बार निकाय चुनावों में लोगों की घटती रुचि को भी गंभीरता से लेकर उसपर काम कर रहे हैं. मुंबई में पिछले चुनावों में मतदान का प्रतिशत 40 के क़रीब था. माना जाता है कि निकाय का चुनाव दरअसल झुग्गी बस्तियों में रहने वालों का चुनाव है और मध्यवर्ग या उच्चवर्ग के लोग उस तरह से इसमें हिस्सा नहीं लेते जिस तरह उन्हें लेना चाहिए. इसके मद्देनज़र अंब्रेला नाम के एक मंच का गठन भी किया गया जिसने मुंबई भर में चुनावों से छह महीने पहले से ही मतदान की ज़रूरतों पर लोगों को जानकारी देने और हस्ताक्षर अभियान चलाने का काम शुरू कर दिया था. संगठन ने साढ़े छह लाख लोगों से हस्ताक्षर करवाए हैं. |
इससे जुड़ी ख़बरें चुनावी अखाड़े में फ़िल्म उद्योग के लोग29 जनवरी, 2007 | पत्रिका कांग्रेस और एनसीपी के बीच तालमेल टूटा13 जनवरी, 2007 | भारत और पड़ोस चुनाव मैदान में उतरीं बार बालाएँ07 जनवरी, 2007 | भारत और पड़ोस लॉटरी ने बदली एक सफ़ाईकर्मी की ज़िंदगी12 नवंबर, 2006 | भारत और पड़ोस मायानगरी में जगह नहीं रहने को11 नवंबर, 2006 | भारत और पड़ोस आरती और अज़ान के साझा सुर04 सितंबर, 2006 | भारत और पड़ोस 'हिटलर' रेस्तराँ का नाम बदल दिया जाएगा25 अगस्त, 2006 | भारत और पड़ोस मुंबई में बारिश से जनजीवन बेहाल07 अगस्त, 2006 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
| |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||