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शनिवार, 11 नवंबर, 2006 को 14:04 GMT तक के समाचार
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मायानगरी में जगह नहीं रहने को

रियाज़ अलमानी
अलमानी को साल भर में मनपसंद मकान नहीं मिला
मुंबई यानी करोड़ों भारतीयों के सपनों का शहर.

अपने सपनों को पूरा करने के लिए लाखों लोग हर साल देश के विभिन्न हिस्सों से इस शहर में आते हैं.

बहुत से लोगों का सपना पूरा भी होता है लेकिन एक जद्दोजहद हमेशा जारी रहती है - एक अदद आशियाने की तलाश.

31 वर्षीय रियाज़ अलमानी एक सफल व्यवसायी हैं और मुंबई में कॉफ़ी की दुकानों की श्रृंखला चलाते हैं. इसके अलावा देश के दूसरे शहरों में भी उनका व्यवसाय है.

इतना सब कुछ जानने के बाद लगता है कि उनके लिए तो अपना मकान सपना नहीं होगा, पर हक़कीत कुछ और है.

एक करोड़ रुपए ख़र्च करने के लिए तैयार होने के बाद भी उन्हें अपने पसंद का मकान नहीं मिला और वे अपने माँ और भाई के साथ ही रह रहे हैं.

अमलानी कहते हैं, ‘‘ जो मकान पसंद है उसे ख़रीदने लायक पैसे नहीं हैं और जिसके लायक पैसे हैं, वो पसंद नहीं हैं.’’

उन्होंने कहा, ‘‘मैंने साल भर पहले मकान ढूंढना शुरू किया था लेकिन अब लगता है कि यब समय की बर्बादी है इसलिए मकान ख़रीदने का इरादा ही छोड़ दिया है.’’

मुंबई में ज़मीन-जायदाद की कीमतों की यह एक बानगी भर है. यह दुनिया के सबसे महँगे शहरों में शुमार है और शायद इस मामले में भारत में सबसे महँगा शहर है.

अधिक माँग

शहर के अंदर ज़मीन की दर तकरीबन 15 हज़ार से लेकर 40,000 हज़ार रुपए प्रति वर्ग फीट है. वहीं शहर के बाहरी इलाक़ों में इसकी क़ीमत पाँच से 25 हज़ार रुपए के बीच है.

नाइट फ़्रैक प्रॉपर्टी कंसलटेंट्स के चेयरमैन प्रणय वकील कहते हैं कि इसकी वज़ह सीमित उपलब्धता है.

वे कहते हैं, ‘‘मुंबई में हर साल 84 हज़ार नए मकानों की ज़रूरत है जबकि उपलब्ध हैं केवल 55 हज़ार. जाहिर है माँग और आपूर्ति के बीच भारी अंतर की वज़ह से क़ीमतें आसमान छू रही हैं और अव्यवस्थित रूप से बने आवासों को बढ़ावा मिला है.’’

मुंबई की झुग्गी बस्ती
मुंबई की आबादी का बड़ा हिस्सा इन झुग्गी बस्तियों में रहता है

ग़ौरतलब है कि शहर की 60 फ़ीसदी आबादी अव्यवस्थित रूप से बने आवासों में रहती है, जिनमें झुग्गी-झोपड़ी भी शामिल हैं.

मुंबई की आबादी तेज़ी से बढ़ने की वज़ह इसका भारत का व्यावसायिक केंद्र होना है. इसलिए रोज़गार की तलाश में काफ़ी तादाद में लोग हर वर्ष मुंबई आते हैं.

‘क़ानून है समस्या’

शहर के मुख्य व्यावसायिक केंद्र बाँद्रा-कूर्ला कॉम्पलेक्स के पास ही एशिया की सबसे बड़ी झुग्गी बस्ती धारावी है. यहाँ भी एक झोपड़ी की क़ीमत डेढ़ लाख़ से लेकर तीन लाख रुपए तक है.

प्रणय वकील कहते हैं एक तो शहर में नए निर्माण के लिए काफ़ी कम ज़मीन है उस पर से सुव्यवस्थित किराया क़ानून न होने से भी समस्याएं बढ़ी हैं.

वे कहते हैं, ‘‘ शहर में एक भी ऐसा बिल्डर या रीयल एस्टेट डेवलपर्स नहीं है जो सिर्फ़ किराये पर देने के लिए अपार्टमेंट बनाए, जबकि यूरोप और अमरीक के शहरों में ऐसे अपार्टमेंट काफ़ी तादाद में होते हैं.’’

दरअसल, वर्ष 1947 का किराया क़ानून इसकी राह में एक समस्या है. इसके तहत किराया वर्ष 1947 के स्तर पर ही तय किया गया है और यह किरायेदारों को मकान खाली न करने के लिए काफ़ी अधिकार देता है.

लेकिन अब राज्य सरकार ने नई आवास नीति घोषित करके इस दिशा में कुछ पहल की है.

इसके तहत मकानों को किराया पर दिए जाने के अलावा नए निर्माणों को को बढ़ावा देना शामिल है. सरकार झुग्गी बस्तियों के विकास के अलावा आवास क्षेत्र में विदेशी निवेश को बढ़ावा देने के उपाय भी कर रही है.

इससे पहले सरकार ने मुंबई के धारावी को आधुनिक बस्ती में तब्दील करने की महत्वाकांक्षी योजना भी बनाई थी.

कभी सरकार ने इसी मुंबई को शंघाई बनाने की भी बात कही थी.

लेकिन क्या इतने भर से मुंबई की समस्या का हल निकल आएगा?

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