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मनमोहन के मन में बसी मायानगरी | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारतीय प्रधानमंत्री ने गुरूवार से मुंबई का दो दिनों का दौरा शुरू किया. इन दो दिनों में प्रधानमंत्री कई समारोहों में शामिल होंगे. ऐसा लगता है कि मुंबई के साथ उनका ख़ास लगाव है. दो साल पहले सत्ता में आने के बाद मनमोहन सिंह की ये मुंबई की सातवीं यात्रा है. इससे पहले भारत के किसी प्रधानमंत्री ने दो साल में मुंबई का इतनी बार दौरा नहीं किया है. क्या इसका मतलब ये निकाला जाए कि सरकार अब राजनीति की बजाय अर्थव्यवस्था पर अब ज्यादा बल दे रही है. लोकमत समाचार के प्रधान संपादक कुमार केतकर इस तर्क से सहमत दिखाई देते है. वे कहते हैं, "एक अर्थशास्त्री और भूतपूर्व वित्त मंत्री होने के नाते डॉक्टर सिंह शहर की आर्थिक केंद्र की भूमिका से बख़ूबी वाकिफ़ है. पहले राजनीति प्रमुख थी लेकिन अब अर्थव्यवस्था है." सपना शहर के कुछ लोगों का मानना है कि मनमोहन सिंह मुंबई को एशिया को आर्थिक केंद्र बनाना चाहते हैं और शायद इसीलिए जब वे प्रधानमंत्री बनने के बाद पहली बार मुंबई आए तो उन्होंने ये घोषणा की कि वो मुंबई को चीन के आर्थिक केंद्र शंघाई से ज्यादा महत्वपूर्ण बनाना चाहते हैं. तब उन्होंने कहा था कि अगले पाँच साल में वे मुंबई को ऐसा शहर बना देंगे कि लोग शंघाई को भूल जाएंगे. इस वादे को पूरा करने के लिये तीन साल बचे हैं. क्या ये सपना साकार हो सकेगा. गारमेंट फैक्ट्री के मालिक समीर मीरचंदानी ये कहते हैं, "मुंबई को शंघाई में तब्दील करना इतना आसान नहीं है. इस शहर में ढेर सारी समस्याएँ हैं, जब शहर की आधी आबादी ही खुले आसमान के नीचे सोती है तो हम शंघाई की बात कैसे कर सकते हैं." ऐसा लगता है कि प्रधानमंत्री इन सारे तथ्यों से प्रभावित नहीं हैं. इस साल मार्च में जब यहाँ आए तो उन्होंने कहा, "इस सपने को साकार करने के लिए जितनी बुनियादी सुविधाओं की ज़रूरत होगी, वो मुहैया कराई जाएगी." कोशिशें तीन महीने बाद जून में उन्होंने अपना वादा पूरा कर दिखाया और इसकी शुरूआत की मेट्रो के शिलान्यास से.
केतकर कहते है कि "तीस साल पुरानी ये योजना सिर्फ कागजों में थी जो कि अब हकीकत बन चुकी है." डेढ़ करोड़ से अधिक आबादी वाले इस शहर में हर वर्ग के लोग रहते है और प्रधानमंत्री के बार-बार मुंबई आने से स्टॉक ब्रोकरों, सामाजिक संगठनों, उद्योगपतियों, झोपड़पटि्टयों में रहने वाले लोगों को एक उम्मीद सी हो चली है. ये साफ़ जाहिर है कि प्रधानमंत्री महानगर में सुविधाओं की कमी से वाकिफ़ हैं और वाकिफ़ हो भी क्यों नहीं, उन्होंने इसका व्यक्तिगत रूप से अनुभव किया है, जब वे रिज़र्व बैंक के गवर्नर थे. लेकिन शहर के आम शहरियों को शिकायत है कि प्रधानमंत्री के सपनों को साकार होने देने में सबसे बड़ी बाधा राज्य सरकार है. मनोरंजन उद्योग से जुड़े विनय रंजन कहते है, "राज्य अधिकारियों के ध्यान न देने की वजह से तुरंत परिणाम सामने नहीं आते. मसलन कई साल पहले बांद्रा वर्ली सी लिंक पुल पर काम शुरू हुआ था और ऐसा लगता है कि इस योजना को पूरा होने में अभी कई साल लगेंगे." | इससे जुड़ी ख़बरें मुंबई में शांति मार्च | भारत और पड़ोस सांप्रदायिक सदभाव की मिसाल | भारत और पड़ोस आगे आ रहे हैं मददगार...16 जुलाई, 2006 | भारत और पड़ोस अवैध इमारतें गिराने का काम शुरू29 जुलाई, 2006 | भारत और पड़ोस मुंबई में बारिश से जनजीवन बेहाल07 अगस्त, 2006 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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