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मंगलवार, 09 जनवरी, 2007 को 14:34 GMT तक के समाचार
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और कंकाल मिलने से मची अफ़रातफ़री

पुलिस गायब बच्चों के रिश्तेदारों के दबाव में
निठारी के पास जिस मकान में बच्चों की नृशंस हत्याएं की गईं, उसके पास बहने वाले नाले से आज कुछ और हड्डियां मिलने से अफ़रातफ़री का माहौल बन गया है.

इसके साथ ही ऐसे लोग लगातार यहाँ पहुँच रहे हैं जिनके बच्चे लापता हुए है.

निठारी के उस मकान के आसपास 50 से भी ज्यादा ऐसे लोग मौजूद हैं, जिनके हाथ में उनके लापता बच्चों की तस्वीरें हैं.

ऐसे लोगों में ज़्यादातर आसपास के रहने वाले हैं पर कुछ लोग दिल्ली, पंजाब या फिर दूसरे दूर के इलाक़ों से भी यहाँ पहुँचे हैं.

पुलिस इनको यहाँ से हटाने की भरपूर कोशिश कर रही है पर उसके बावजूद ये लोग यहाँ डटे हुए हैं.

मायूसी

हालाँकि यहाँ डटे रहने से उनकी मायूसी बढ़ ही रही है क्योंकि पुलिस उन्हें बता रही है कि जाँच सीबीआई के हवाले कर दी गई है और अब शिनाख्त का काम भी अब उसे ही करना है और इसमें कुछ समय लगेगा.

 मेरे बेटे का नाम विकास है और वह तीन महीने से गायब है. पर मेरी कोई सुनवाई नहीं हो रही है. मुझे तो पुलिस ने कपड़े तक नहीं दिखाए
उमा, पीड़ित

यहाँ मौजूद लोगों में से एक राजवती का कहना था, “दो साल से मेरी बच्ची गायब है, मेरी बेटी का नाम पूजा है और नोएडा के सेक्टर-39 के थाने में मेरी शिकायत भी दर्ज है. मैं अपनी बच्ची के कपड़े पहचान चुकी हूँ, पर पुलिस मेरे खून का नमूना जाँच के लिए नहीं ले रही है.”

जबकि उमा का कहना था, “मेरे बेटे का नाम विकास है और वह तीन महीने से गायब है. पर मेरी कोई सुनवाई नहीं हो रही है. मुझे तो पुलिस ने कपड़े तक नहीं दिखाए.”

जहाँ एक तरफ इन लोगों का धीरज टूट रहा है, वहीं इस कोठी के आसपास के इलाक़े में दहशत का माहौल है.

आशंका

इस क्षेत्र के लोगों से बात करने पर पता चलता है कि इस हत्याकांड के कथित अभियुक्तों की गिरफ़्तारी के बाद भी इनके मन की आशंका दूर नहीं हुई है.

 हमारे बच्चे दहशत के साए में जी रहे हैं और फिलहाल तो हम भी उन्हें डराकर रख रहे हैं कि वो अकेले घर से बाहर नहीं निकलें. क्या पता मोनिंदर और सुरेंद्र के कुछ साथी अभी भी बच्चों पर नज़र रखे हों
वरुण शर्मा, स्थानीय निवासी

निठारी गाँव के रहने वाले राजेंद्र् कहते हैं, “सीबीआई जाँच के ऐलान के बाद भी सीबीआई का कोई आदमी आज तक यहाँ नहीं आया है. हमें अब भी विश्वास नहीं है कि दोषियों को पुलिस सज़ा दिलवा पाएगी.”

जबकि वरुण शर्मा कहते हैं, “हमारे बच्चे दहशत के साए में जी रहे हैं और फिलहाल तो हम भी उन्हें डराकर रख रहे हैं कि वो अकेले घर से बाहर नहीं निकलें. क्या पता मोनिंदर और सुरेंद्र के कुछ साथी अभी भी बच्चों पर नज़र रखे हों.”

कुल मिलाकर राज्य सरकार की पूरी कार्रवाई पर यहाँ का आम आदमी बहुत भरोसा नहीं कर रहा है और अभी भी दहशत और आशंकाओं में जी रहा है.

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