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सोमवार, 08 जनवरी, 2007 को 02:09 GMT तक के समाचार
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नेपाल में आज से काम संभालेंगे पर्यवेक्षक
प्रधानमंत्री कोइराला और माओवादी नेता प्रचंड
नवंबर में अंतरिम सरकार और माओवादियों के बीच समझौता हुआ
नेपाल में दस साल लंबे संघर्ष को ख़त्म करने वाले युद्धविराम समझौते के दो महीने बाद संयुक्त राष्ट्र के हथियार पर्यवेक्षकों या निगरानीकर्ताओं के दो दल सोमवार से अपना काम संभाल रहे हैं.

अभी हालांकि पर्यवेक्षकों की संख्या बहुत कम है लेकिन इस हफ़्ते के अंत में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में नेपाल के विषय में चर्चा होने के बाद इसमें बढ़ोत्तरी की बड़ी संभावनाएँ हैं.

युद्धविराम समझौते के तहत माओवादी लड़ाकों ने हथियार छोड़कर सरकार में शामिल होना स्वीकार किया था और मान लिया था कि उनके हथियारों की निगरानी संयुक्त राष्ट्र के पर्यवेक्षक करेंगे.

ये पर्यवेक्षक या तो सेना में हैं या फिर पूर्व सैनिक हैं. ये जापान, यमन और कनाडा जैसे देशों से आए हैं.

फ़िलहाल इनकी संख्या 13 है और छह और पर्यवेक्षक जल्दी ही इंडोनेशिया से आने वाले हैं. लेकिन संभावना है कि इनकी संख्या बढ़कर 150 के क़रीब भी पहुँच जाए.

यह निर्भर करता है कि सप्ताह के अंत में संयुक्त राष्ट्र महासचिव अपनी रिपोर्ट में क्या कहते हैं, जिसे सुरक्षा परिषद को पारित भी करना है.

तालों में हथियार

संयुक्त राष्ट्र के पर्यवेक्षक अगले हफ़्ते से माओवादी विद्रोहियों के हथियारों को ताले में बंद करना शुरु कर देंगे.

माओवादी
माओवादियों के हथियारों के बराबर हथियार सेना भी ताले में बंद करवाएगी

इसके लिए कंटेनर पहले से ही रख दिए गए हैं.

पर्यवेक्षकों को इस काम में सहायता मिलने वाली है, सेवानिवृत्त गोरखा सिपाहियों से. ये नेपाली सिपाही भारतीय और ब्रितानी सेना में काम कर चुके हैं.

इस काम के लिए सौ से अधिक पूर्व गोरखा सैनिकों का चयन कर लिया गया है जो माओवादियों के हथियारों का रजिस्ट्रेशन करेंगे और उन्हें जमा कर लेगें.

इसके बाद नेपाल की सेना के हथियार भी बराबर संख्या में लाकर यहाँ बंद कर दिए जाएँगे.

ये पूर्व गोरखा सिपाही तब तक माओवादियों के कैंपों में रहेंगे जब तक पर्यवेक्षक पूरी तरह से काम नहीं संभाल लेते.

ख़बरें हैं कि माओवादी कैंपों की हालत अच्छी नहीं है लेकिन माओवादियों ने संयुक्त राष्ट्र के खाद्य कार्यक्रम से कोई सहायता लेने से इनकार कर दिया है.

बीबीसी के काठमांडू संवाददाता चार्ल्स हैवीलैंड का कहना है कि इस शांति प्रक्रिया को लेकर एक तरह का संदेह बना हुआ है क्योंकि इसके अमल के लिए कोई निश्चित टाइम-टेबल नहीं बनाया गया है.

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