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क्यों प्यासा है देवों का घर | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
बिहार और झारखंड प्रदेश में अपने श्रोताओं और अपने पाठकों से रू-ब-रू होने निकले बीबीसी हिंदी कारवाँ ने अपने अगले पड़ाव में डेरा डाला देवघर में. और इस पड़ाव में चर्चा हुई झारखंड के शहर देवघर में पानी की किल्लत की. पिछले कई वर्षों से देवघरवासी पानी के संकट के सामने बेबस हैं. और ये विडंबना ही लगती है कि जिस देवघर में श्रावण के महीने में दूर-दूर से हिंदू श्रद्धालु काँवड़ पर पानी लेकर अपने आराध्य शिव को अर्पित करते हैं, वो देवघर आज पानी के लिए तरस रहा है. देवघर एक ऐतिहासिक तीर्थस्थल है जहाँ प्रख्यात मंदिर है बैद्यनाथधाम. भारत के 12 ज्योतिर्लिंगों में बैद्यनाथधाम भी एक है. कई पुराणों में बैद्यनाथधाम की महिमा का बखान है. संकट मगर जिस देवघर में दूर-दराज से श्रद्धालु आकर जल अर्पित करते हैं, आज वहाँ जलसंकट खड़ा हो गया है. बीबीसी हिंदी रोडशो की परिचर्चा – क्यों है प्यासा देवघर में – इसी जलसंकट की बात हुई. बीबीसी के मंच तले आम लोगों ने अपनी आपबीती सुनाई और फिर समस्या की पड़ताल हुई. उन लोगों से जवाब तलब किए गए जिनपर जल संकट का हल निकालने की ज़िम्मेदारी है. बीबीसी के एक श्रोता ने कहा, "हमें अकसर आधी रात में जाकर पोखरों से पानी जुटाना होता है क्योंकि अगर रात में पानी की ज़रूरत हुई तो उसका कोई उपाय नहीं है." एक गृहिणी सुजाता प्रसाद ने कहा, "मुझे और मेरे पति को दूर-दूर से पानी ढोकर लाना पड़ता है. बीस साल पहले शादी के समय मैंने अपनी ससुराल में एक नल देखा था, बताया गया कि इससे पानी आएगा. पानी आज तक नहीं आया." वहीं एक किसान वरूण राय ने कहा, "देवघर ज़िले के किसान बस भगवान भरोसे खेती कर रहे हैं. और चिंता की बात ये है कि जब शहर के लोगों की समस्या दूर नहीं हो पा रही तो किसानों की कौन सुनेगा." कारण समस्या क्या है, इस संबंध में कई तरह की बातें सामने आईं.
एक स्थानीय नेता उपेन्द्र चौरसिया ने कहा, "भू-माफ़िया ने शहर के तालाबों को भरकर उनपर इमारतें खड़ी कर ली हैं, नतीजा पानी का स्रोत कम होता जा रहा है." देवघर ज़िले में पानी की समस्या पर काम करने वाले एक ग़ैरसरकारी संगठन 'जुड़ाव' के प्रतिनिधि घनश्याम ने समस्या को थोड़ा विस्तार से देखने की बात की. घनश्याम ने कहा, "देवघर के आस-पास पहले वन थे, मगर अवैध कटाई के कारण पेड़ कम होते जा रहे हैं, इस कारण बरसात का पानी ज़मीन में संचित नहीं हो पा रहा और जलस्तर दिन-प्रतिदिन कम होता जा रहा है." दूसरी तरफ़ देवघर के आर्थिक विकास और उसमें आमजनों की भागीदारी पर शोध करनेवाली आलोचक इंदुरानी केशवानी का कहना था, "शिकायतें अपनी जगह ठीक हैं लेकिन आम लोग भी कम दोषी नहीं हैं. देवघर में आम लोग बड़ी लापरवाही से पानी बर्बाद कर रहे हैं." सुझाव फिर कटघरे में खड़ा किया गया प्रशासन को. देवघर के सब डिवीज़नल ऑफ़िसर उमेश चंद्र सिंह और पेयजल आपूर्ति विभाग के एक्ज़िक्यूटिव इंजीनियर बाल्मीकि प्रसाद सिंह ने बताया कि जल संकट के निराकरण के लिए क्या प्रयास किए जा रहे हैं. उमेश चंद्र सिंह ने कहा, "देवघर में जो व्यवस्था है अभी पानी की वो 1958 की बनी योजना पर आधारित है जो केवल 25-30 हज़ार लोगों की ज़रूरत पर आधारित थी. जनसंख्या अब काफ़ी बढ़ चुकी है और इसे देखते हुए हम अब नई योजना तैयार कर रहे हैं." बाल्मीकि प्रसाद सिंह ने बड़े विश्वास से दावा किया, "हमारे पास पर्याप्त योजना है, देवघर के लोगों को दोगुना पानी मिलेगा. आनेवाले 50 वर्षों-100 वर्षों में देवघर के लोगों को पानी के लिए तरसना नहीं पड़ेगा. अगले वर्ष मार्च तक इसका असर दिखने लगेगा." लेकिन सच्चाई ये थी कि प्रशासन के दावों पर यकीन करनेवाला सभा में शायद ही कोई था. फिर भी आशा की एक किरण दिखी सभा में आमंत्रित देवघर के एक रिटायर्ड प्रोफ़ेसर की बातों से जिन्होंने भारत की आज़ादी से पहले से लेकर अब तक ऐसी कितनी ही जन अदालतों में हुई सुनवाइयाँ सुनी थीं जिनमें शिकायतों के भी दौर आए और आश्वासनों के भी पुल बँधे. 93 वर्षीय श्रीनंदन सहाय के शब्द थे, "इतनी जो बहस हुई उससे कुछ-न-कुछ तो ज़रूर निकलेगा. प्रशासन की तरफ़ से आश्वासन मिला.और हमारा भी कर्तव्य है कि हम पानी बर्बाद ना करें. और जो पानी घर के बाहर जाता है उसका कुछ ऐसा इस्तेमाल करें जिससे कि हमारा पर्यावरण सुंदर हो, सुखद हो." यानी प्रशासन अपना दायित्व निभाए और नागरिकों को भी अपना कर्तव्य याद रहे. शायद बीबीसी हिंदी की परिचर्चा की सार्थकता भी इन्हीं शब्दों से हो सकती है. | इससे जुड़ी ख़बरें क्या हैं उत्तर प्रदेश के लोगों के सरोकार?27 नवंबर, 2006 | भारत और पड़ोस क्या हैं झारखंड के लोगों के सरोकार?27 नवंबर, 2006 | भारत और पड़ोस क्या हैं बिहार के लोगों के सरोकार?27 नवंबर, 2006 | भारत और पड़ोस बिजली पैदा करनेवाले क्षेत्र की ही बिजली गुल27 नवंबर, 2006 | भारत और पड़ोस बीबीसी हिंदी का रोड शो बिहार पहुँचा24 नवंबर, 2006 | भारत और पड़ोस प्रदूषण कम करें, उद्योग नहीं21 नवंबर, 2006 | भारत और पड़ोस 'भारत के स्विट्ज़रलैंड' में नक्सलवाद हावी19 नवंबर, 2006 | भारत और पड़ोस 'कालीन है तो रोज़गार है'16 नवंबर, 2006 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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