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'कालीन है तो रोज़गार है' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
बीबीसी हिंदी रोड शो की शुरुआत भदोही में गर्मागर्म परिचर्चा से हुई. परिचर्चा का विषय था 'कालीन है तो रोज़गार है'. इसमें सभी पक्षों ने अपनी राय रखी. इस परिचर्चा में कालीन उद्योग से जुड़े कई पहलुओं और विभिन्न पक्षों की बात रखी गई. जब बीबीसी की टीम इंदर बहादुर सिंह नेशनल इंटर कॉलेज पहुँची तो वहाँ पहले से ही लोगों की ख़ासी भीड़ थी और मंच पर बीबीसी से संबंधित एक लघु नाटिका खेली जा रही थी. परिचर्चा की शुरुआत करते हुए ऑल इंडिया कारपेट मैन्युफ़ैक्चरर एसोसिएशन (एआईसीएमए) के सचिव अविनाश चंद्र बरनवाल ने कहा कि कालीन के निर्यात से भारत को प्रतिवर्ष 3000 करोड़ रुपयों की आय होती है. उनका कहना था कि भारत में बनने वाली 80 फ़ीसदी कालीनें भदोही, मिर्ज़ापुर और वाराणसी में बनाई जाती हैं. बुनकर मज़दूरों की राय थी कि इस इलाक़े में न्यूनतम मज़दूरी क़ानून का ज़ोर-शोर से उल्लंघन होता है और न तो उन्हें उचित मेहनताना मिलता है और न इस बात का ध्यान रखा जाता है कि वे कितनी दयनीय स्थिति में रह रहे हैं.
इस पर एआईसीएमए की ओर से बोलते हुए रवि पटेरिया ने कहा कि विदेशों में हाथ से बुने हुए कालीनों की माँग कम होती जा रही है क्योंकि ये मशीनों से बुने हुए कालीनों की तुलना में महँगे होते हैं. उनका कहना था कि इसके बावजूद कालीनों की बिक्री से होने वाली आमदनी का 55 फ़ीसदी वेतन के रुप में बुनकरों को दिया जा रहा है. कई आम नागरिकों ने अपनी राय रखते हुए कहा कि अगर ऐसा है तो लोग इस पेशे को छोड़कर दूसरे पेशे को क्यों अपना रहे हैं. कालीन उद्योग में बाल मजदूरों के बारे में तर्क आया कि क़ानूनी रुप से घरों पर काम करने वाले बच्चों को बाल मज़दूर नहीं कहा जाता क्योंकि कारखानों में लूम्स लगाने के बजाय परिवारों को अपने घरों पर कालीन बनाने का काम ठेके पर दिया जाता है जहाँ कि बच्चों के काम करने पर मनाही नहीं होती.
लेकिन कालीन बनाने वालों और मज़दूरों दोनों की राय थी कि बाल मज़दूरों की बात को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता रहा है ताकि विदेशों में भारतीय कालीनों की माँग प्रभावित हो. श्रमिकों की तरफ़ से माँग की गई कि कालीन श्रमिकों का एक संगठन बनाया जाए जो कि उनके अधिकारों के लिए लड़े. कालीनों का विदेशों में निर्यात करने वाली अल्पा मेवावाला ने कहा कि भारत में कालीनों की मार्केटिंग बेहतर ढंग से होनी चाहिए. माँग की गई कि भदोही की बुनियादी सुविधाएँ जैसे सड़क और बिजली की सुविधा बेहतर होनी चाहिए. अब्दुल हादी का कहना था कि सरकार को इस उद्योग को फिर से उठाने के लिए करों में छूट देनी चाहिए और इसका लाभ सिर्फ़ कालीन विक्रेताओं को न मिलकर बुनकरों तक पहुँचना चाहिए. परिचर्चा का संचालन रेहान फ़ज़ल ने किया. | इससे जुड़ी ख़बरें बीबीसी हिन्दी रोड शो कार्यक्रम13 नवंबर, 2006 | भारत और पड़ोस काग़ज़ और क़ैंची का कलाकार13 नवंबर, 2006 | भारत और पड़ोस ख़तरे में झारखंड के पहड़िया आदिवासी24 मार्च, 2005 | भारत और पड़ोस ‘कैसे आबाद हो धनबाद’ 22 मार्च, 2005 | भारत और पड़ोस विदेशियों का मोहताज नहीं है विदिशा09 मार्च, 2005 | भारत और पड़ोस चल पड़ा बीबीसी हिंदी का कारवाँ04 फ़रवरी, 2004 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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