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प्रदूषण कम करें, उद्योग नहीं | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
उत्तर प्रदेश में सोनभद्र ज़िले के रेणुकूट में बीबीसी हिंदी रोडशो के दौरान आयोजित परिचर्चा में यह बात उभरकर सामने आई कि इस क्षेत्र में तत्काल प्रदूषण कम किए जाने की ज़रूरत है लेकिन क्षेत्र को उद्योगों की भी आवश्यकता है. बीबीसी का कारवाँ इन दिनों विभिन्न शहरों में घूम रहा है और औद्योगिक नगरी रेणुकूट में चर्चा का विषय था- बड़े उद्योग: यहाँ विकास, वहाँ प्रदूषण. रेणुकूट उत्तर प्रदेश का छोटा-सा कस्बा है लेकिन यहाँ कई बड़े उद्योग स्थापित हैं जिनकी वजह से यहाँ प्रदूषण एक बड़ी समस्या है और यहाँ के निवासी उससे प्रभावित हैं. इस बहस में हिस्सा लेने के लिए श्रमिक नेता, राजनीतिज्ञ, डॉक्टर, पुलिस अधिकारी, उद्योगजगत के प्रतिनिधि, पत्रकार और पर्यावरणविद् सभी मौजूद थे. सामंजस्य ज़रूरी राजनेता कांशीनाथ सिंह का कहना था कि पर्यावरण और उद्योगजगत में सामंजस्य होना चाहिए. सरकार ने इस संबंध में कड़े क़ानून बनाए हैं, उनपर अमल होना चाहिए. उनका कहना था कि उद्योगपतियों को भी इस ओर ध्यान देना चाहिए. डॉक्टर सुमन शर्मा ने यहाँ के जल और वायु प्रदूषण की गंभीरता को सामने रखा. उनका कहना था कि इसकी वजह से एलर्जी, अस्थमा और टीबी जैसे रोग बढ़ रहे हैं. एक अन्य डॉक्टर गीतांजलि शर्मा का कहना था कि यहाँ के प्रदूषित पानी की वजह से स्थायी विकलांगता के मामले बढ़ रहे हैं. श्रमिक नेता और इंटक से जुड़े सच्चिदानंद श्रीवास्तव ने कहा कि कुछ पाने के लिए कुछ खोना भी पड़ता है. उन्होंने 60 के दशक की याद दिलाई जब एल्युमिनियम उत्पादन इकाई हिंडालको नहीं खुली थी और उस समय क्षेत्र के विकास की क्या स्थिति थी.
उनका कहना था कि हिंडालको के आने से इस क्षेत्र का विकास हुआ और स्वरूप बदला. गंभीरता नहीं है स्थानीय पत्रकार विजयशंकर चतुर्वेदी का कहना था कि पर्यावरण गंभीर विषय है लेकिन उसे गंभीरता से नहीं लिया जा रहा है और प्राथमिकता नहीं दी जा रही है. उद्योगजगत की ओर से कनौरिया केमिकल्स के प्रतिनिधि संजय शर्मा का कहना था कि सरकारी नियमों और मानकों के अनुसार काम चल रहा है. उन्होंने साफ़ किया कि वो ऐसा नहीं कहते हैं कि इस क्षेत्र में प्रदूषण नहीं है. लेकिन पिछले पाँच वर्षों में इस क्षेत्र में सराहनीय कार्य हुआ है. पुलिस क्षेत्राधिकारी सुधाकर यादव का कहना था कि प्रदूषण का वैज्ञानिक अध्ययन किए जाने की ज़रूरत है. इस बहस में श्रोताओं की भागीदारी रही. बीबीसी के एक पुराने श्रोता लखनराम ने एक कविता भी सुनाई. नज़दीक के एक गाँव पिपरी से आए जीके मदान एक बोतल में पानी भर कर लाए थे जो एकदम मटमैला था. उनका कहना था कि उनके गाँव में ऐसे पानी की आपूर्ति की जाती है. एक अन्य श्रोता अशोक कुमार सिंह एक घास का पौधा लाए थे और उनका कहना था कि ये ‘अमरीकन घास’ कई तरह के रोगों की जड़ है और लोगों को इसके प्रति जागरूक बनाए जाने की ज़रूरत है. कई स्कूली बच्चों ने भी सवाल किए. एक बच्चे उत्कर्ष का सवाल था कि उद्योगों से हज़ारों लोगों को रोज़गार मिलता है, यदि ये बंद हो जाएँ तो लोगों का क्या होगा. एक श्रमिक राकेश कुमार सिंह ने क्रेशरों के कारण होनेवाले वायु प्रदूषण का मुद्दा उठाया तो महेश पांडे ने लगभग दो लाख की आबादी वाले कस्बे में एक भी डिग्री कॉलेज न होने की बात उठाई. इस कार्यक्रम का संचालन बीबीसी संवाददाता आकाश सोनी ने किया. | इससे जुड़ी ख़बरें बीबीसी हिन्दी रोड शो कार्यक्रम13 नवंबर, 2006 | भारत और पड़ोस बीबीसी हिंदी का रोड शो 16 नवंबर से13 नवंबर, 2006 | भारत और पड़ोस काग़ज़ और क़ैंची का कलाकार13 नवंबर, 2006 | भारत और पड़ोस 'भारत के स्विट्ज़रलैंड' में नक्सलवाद हावी19 नवंबर, 2006 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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