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क्या हैं बिहार के लोगों के सरोकार? | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
आपकी दुनिया, आपकी आवाज़ रोड शो शुरू करने से पहले, बीबीसी ने दिल्ली स्थित संस्था प्रस्तुत के ज़रिये एक विशेष सर्वेक्षण कराया था, यह जानने के लिए की लोगों की चिंताएँ क्या हैं, उनके सरोकार क्या हैं. इस सर्वेक्षण से प्राप्त जानकारी के आधार पर उत्तरप्रदेश, बिहार और झारखंड के 14 ज़िलों में परिचर्चाएँ आयोजित की जा रही हैं. प्रत्येक शहर के लोगों का मानना था कि बीबीसी परिवर्तन में अहम भूमिका निभा सकती है. उन्होंने बीबीसी के कार्यक्रमों की भरपूर प्रशंसा की. लोगों के मन में पत्रकारों के लिए गहरा सम्मान है. उन्होंने उनकी इस बात के लिए सराहना की वे अधिकारियों से बात-चीत करने में सक्षम हैं. बिहार के जिन आठ शहरों में सर्वेक्षण किया गया, वे हैं आरा, गोपालगंज, हाजीपुर, नवादा, सासाराम और सीवान. यहाँ किसानों, व्यवसायियों, पुलिस अधिकारियों, मीडिया कर्मियों तथा शिक्षाकर्मियों आदि अनेक लोगों से उनकी चिंताओं के विषय में बातचीत की गई. हर शहर के लोगों ने अपराध, भष्टाचार और क़ानून-व्यवस्था की चर्चा की. बेरोज़गारी यहाँ एक बड़ा मुद्दा था जिसे बिहार में बढ़ते अपराध का मुख्य कारण बताया गया. बढ़ते उपभोक्तावाद के चलते, लोगों में यह धारणा भी घर कर रही है कि अपराध तेजी से पैसा बनाने का एक आसान तरीका है. इस स्थिति के लिए जो दो मुख्य कारण बताए गए थे उनमें पहला है स्कूलों की कमी और शिक्षा का निम्न स्तर और दूसरा निवेश की कमी और स्थानीय व्यवसाय को समर्थन का अभाव. लोगों का मानना था रोज़गार की तलाश में लोग बड़े शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं. उनकी शिकायत है कि पलायन को रोकने के लिए सरकार द्वारा क्षेत्र में उद्योग धंधों का विकास आरा अपहरण, हत्या और चोरी-चकारी यहाँ होने वाली रोज़मर्रा की घटनाएँ हैं. लोग बुरी तरह भयभीत हैं. व्यवसाय से जुड़े लोग खासतौर पर परेशान और डरे हुए हैं. एक डॉक्टर के अपहरण से मामला और भी बिगड़ गया था, क्योंकि उसके समर्थन में इलाके के अन्य डॉक्टरों ने भी हड़ताल कर दी. बेरोज़गारी की समस्या के पीछे जातीय व्यवस्था का हाथ माना जा रहा है. चूँकि आरा में अलग-अलग कामों के लिए अलग-अलग जाति विशेष के लोगों को ही उपयुक्त माना जाता है. इसलिए लोग यहाँ से पलायन कर जाते हैं. यहाँ खाद का मसला किसानों की चिंता का कारण है. लोगों का कहना है कि जहाँ सरकार समानता के आधार पर पर्याप्त मात्रा में खाद उपलब्ध कराने के लिए कुछ ख़ास नहीं कर रही, वहीं निजी कंपनियों द्वारा मुहैया की जाने वाली खाद महँगी होने के साथ घटिया क्वालिटी की होती है, जिसकी वजह से कर्ज़ और उससे जुड़ी अन्य समस्याएँ उठ खड़ी होती हैं. बरौनी यहाँ का लगभग हर नागरिक असुरक्षित और भयभीत महसूस करता है. लोगों को संदेह है कि पुलिस के कुछ लोग ही बड़े-बड़े अपराधियों को संरक्षण दे रहे हैं, जिसके चलते वे आम लोगों को सुरक्षा मुहैया कराने में असमर्थ हैं. लोगों का यह भी मानना है कि पुलिस को नई कार्यशैली में प्रशिक्षित करने की ज़रूरत है क्योंकि वह अभी तक वर्षों पुराने कायदे क़ानून के अनुसार काम कर रही है, जिनका आज की हकीकत से कोई वास्ता नहीं है. सरकार ने यहाँ पर उद्योग शुरू करने और 65000 लोगों को रोज़गार देने के अपने वायदे को पूरा नहीं किया है और चूँकि स्थानीय लोगों को रोज़गार देने लायक उद्योग धंधे नहीं है, इसलिए काम की तलाश में लोग दूसरे शहरों का रूख कर रहे हैं. लोग चाहते हैं कि शहर की मुख्य प्रशासनिक समस्याओं और सामुदायिक शिकायतों के निवारण के लिए यहाँ पर नगर पालिका का गठन किया जाए. इसका भी वायदा किया गया था, परंतु अमल आज तक नहीं हो पाया है. गोपालगंज लोगों की एक आम शिकायत यह थी कि सरकार की ओर से सहायता उन्हें नहीं मिलती. वे भ्रष्टाचार से निराश हैं, जो उनके अनुसार जीवन के हर क्षेत्र में घर कर चुका है. उनकी शिकायत है कि हर काम के लिए सरकारी अफसर उनसे रिश्वत माँगते हैं. गैंग-वॉर, अपहरण और डकैती की ख़बरें हैं. बेरोज़गारी ने समाज के हर वर्ग को प्रभावित किया है. माँ-बाप अपने बच्चों को रोज़गार के लिए दूर दूर भेज रहे हैं. उनके मन में यह डर भी बैठ गया है कि स्थानीय लोगों की क़ीमत पर बाहरी लोगों को यहाँ व्यवसाय करने के लिए प्रोत्साहन दिया जा रहा है, क्योंकि स्थानीय लोगों को आसानी से बैंक कर्ज़ नहीं मिल पाता. बहुत सारे लोगों की शिकायत है कि स्थिति को सुधारने के लिए सरकार कुछ विशेष नहीं कर रही है. हाजीपुर बेरोज़गारी की समस्या यहाँ विकट है. उच्च शिक्षा प्राप्त लोगों को नौकरी के लिए बहुत संघर्ष करना पड़ता है. इसे बढ़ते अपराध की एक मुख्य वजह माना जा रहा है. दूसरा बड़ा मुद्दा भ्रष्टाचार का है. लोगों का सरकारी अधिकारियों से मोहभंग हो चुका है. वे रिश्वत माँगते हैं और सरकार उनकी अनदेखी करती है. हालाँकि यह समस्या नई नहीं है, परंतु लोग कहते हैं कि उन्हें पहले की अपेक्षा अब ज़्यादा रिश्वत देनी पड़ती है. एक शिकायत लोगों की यह थी कि सड़कों पर कूड़े की ओर किसी का ध्यान नहीं जाता है जिसके कारण बीमारियों की आशंका बनी रहती है. मुंगेर दिन दहाड़े डकैती, अपहरण और असुरक्षित सड़कें, ये सब कुछ मुंगेर के जन-जीवन का अभिन्न अंग है. यहाँ लोगों का मानना है कि आसानी से मिलने वाले गै़र-क़ानूनी हथियारों और घटती पुलिस फोर्स से समस्या कई गुणा बढ़ गई है. बड़ी संख्या में युवा बेरोज़गार हैं, अतः लोग चाहते हैं कि सरकार नौकरियों के अवसर पैदा करे ताकि अपराध की जगह ये लोग नौकरियों की ओर आकर्षित हों. बहुत बड़ी संख्या में लोगों का यह मानना है कि मौजूदा तरीकों से अपराध पर काबू पाना संभव नहीं है, इसके लिए पुलिस को और ज्यादा अधिकार दिए जाने चाहिएँ. बिजली और पानी की समस्या भी बहुत बड़ी समस्या है. चार ट्रांसमीटर बेकार पड़े हैं, जबकि आर्दश स्थिति में 18 घंटे तक बिजली उपलब्ध रहनी चाहिए. परंतु दो घंटे लगातार बिजली मिलना भी यहाँ एक ‘सपना’ बना हुआ है. इसके कारण पानी भी समस्या बना हुआ है. अधिकारियों का कहना है कि पूरे शहर को पानी मुहैया कराने के लिए दिन में कम से कम 12-14 घंटे के लिए बिजली का रहना अनिवार्य है. ऊपर से लगातार वर्षा की कमी ने स्थिति को और भी गंभीर बना डाला है. नवादा यहाँ भी क़ानून-व्यवस्था की स्थिति ख़राब हुई है. जबकि कुछ लोग अपनी सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं, वहीं कुछ ने उम्मीद का दामन अभी नहीं छोड़ा है. यह शहर बेरोज़गारी की समस्या से भी जूझ रहा है, जिसका दोष लोग शिक्षा-व्यवस्था और बंद हो रहे उद्योग धंधों को देते हैं. उनका कहना है कि उद्योग बंद कर दिए जाने से युवाओं के पास विकल्प नहीं बचे हैं. बिजली की समस्या से हर कोई प्रभावित हुआ है और ख़ासतौर पर किसानों को समय से उचित दामों पर खाद और बीज नहीं मिल पाते हैं. सासाराम इधर कुछ वर्षों में नक्सलवादियों की आपराधिक गतिविधियां बढ़ी हैं. हालाँकि पुलिस का दावा है कि अब स्थिति नियंत्रण में है, परंतु लोगों का इस बात पर भरोसा कम है कि यह शांति ज्यादा देर तक बनी रहेगी. हाल की चरमपंथी गतिविधियों में बढ़ौत्तरी के लिए लोग बेरोज़गारी, शिक्षा के अभाव और स्थानीय राजनीति को जिम्मेदार मानते हैं, वे कहते हैं कि सरकारी नीतियों का ठीक से पालन किया जाए तो युवाओं के लिए रोज़गार के नए अवसर पैदा हो सकते हैं. उनको य़कीन है कि इससे नए नक्सल गुटों के संगठित होने पर रोक लगेगी और उनका प्रभाव भी घटेगा. इस सर्वेक्षण के दौरान, जब यह पता चला कि सरकार ने कुछ अध्यापकों की नियुक्ति की घोषणा की है, तो लोगों में उत्साह की लहर दौड़ गई. लोग इस मुद्दे पर तो सरकार की सफलता को लेकर अति उत्साहित दिखे, परंतु वे इस बात से चिंतित थे कि सरकारी नीतियों के चलते परिवार टूट रहे हैं. इसे भारतीय समाज के समूचे ढाँचे के लिए ख़तरा माना जा रहा है. डॉक्टरों अथवा वकीलों की आय की कोई सीमा निर्धारित नहीं की गई है, वहीं किसानों तथा 50 एकड़ से अधिक ज़मीन रखने वाले परिवारों की आय की सीमा तय कर दी गई है और उन्हें सरकारी मदद से बाहर रखा गया है. इसलिए सरकारी लाभ पाने की चाह में ये परिवार भूमि का बँटवारा करने में लगे हैं. सीवान यहाँ भी लोगों में इस बात को लेकर निराशा है कि भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ पुलिस कुछ ख़ास नहीं कर रही है, ख़ासतौर पर आवास आबंटन के मामले में. यहाँ यह धारणा है कि सब से ज़्यादा नुकसान गरीबों को झेलना पड़ता है. बेरोज़गारी की समस्या हर वर्ग के लोगों के लिए एक जैसी है. सीवान में चीनी मिलों के बंद हो जाने के कारण लोग पंजाब, हरियाणा और दिल्ली जैसे शहरों में पलायन कर गए हैं, जहाँ वे मजदूरी करते हैं. किसान पानी और सूखे की समस्या से जूझ रहे हैं. इस इलाके में भले ही कृषि में निवेश बढ़ा है, मगर आय घटी है. इन सब मुद्दों पर तो बीबीसी के कार्यक्रमों में विश्लेषण और चर्चाएं होंगी ही, बिहार में आपकी दुनिया, आपकी आवाज़ रोड शो के दौरान जिन विषयों पर चर्चाएं केंद्रित रहेंगी, वे हैं: साराराम 25/11 कृषि से जुड़े मामले | इससे जुड़ी ख़बरें 'भारत के स्विट्ज़रलैंड' में नक्सलवाद हावी19 नवंबर, 2006 | भारत और पड़ोस बीबीसी हिन्दी रोड शो कार्यक्रम13 नवंबर, 2006 | भारत और पड़ोस 'कालीन है तो रोज़गार है'16 नवंबर, 2006 | भारत और पड़ोस बीबीसी हिंदी का रोड शो बिहार पहुँचा24 नवंबर, 2006 | भारत और पड़ोस प्रदूषण कम करें, उद्योग नहीं21 नवंबर, 2006 | भारत और पड़ोस काग़ज़ और क़ैंची का कलाकार13 नवंबर, 2006 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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