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मंगलवार, 21 नवंबर, 2006 को 17:04 GMT तक के समाचार
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कर्णप्रिय घोषणाओं और समझौतों के बीच

मनमोहन सिंह और हू जिंताओ
फासले कम होने के आसार
1996 में तत्कालीन चीनी राष्ट्रपति ज्यांग जेमिन के बाद हू जिंताओ चीन के पहले राष्ट्राध्यक्ष हैं जो भारत की यात्रा पर आए हैं लेकिन एक दशक के इस अंतराल के बीच भी नेताओं के मुलाकातों का सिलसिला लगातार जारी रहा है.

पिछले डेढ़ वर्षों के दरम्यान ही मनमोहन सिंह और हू जिंताओ की विभिन्न अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर करीब आधा दर्जन मुलाकातें हो चुकी हैं.

इस तरह से इस मर्तबा एक महत्वपूर्ण एवं अर्थपूर्ण द्विपक्षीय मुलाकात की भूमिका पहले से तैयार थी और हुआ भी कुछ ऐसा ही.

मंगलवार को हू जिंताओ और मनमोहन सिंह के बीच की मुलाकात करीब दो घंटे तक चली जिसमें से करीब चालीस मिनट तक नेताओं ने आपस में केवल कुछ प्रमुख सलाहकारों की उपस्थिति में अंतरंग वार्त्ता की.

बकौल भारतीय विदेश सचिव शिवशंकर मेनन वे बातचीत के वातावरण और नतीजे से पूरी तरह से संतुष्ट हैं.

चीन के राष्ट्रपति की यात्रा से ठीक पूर्व दिल्ली में चीनी राजदूत द्वारा अरुणाचल प्रदेश पर बीजिंग का हक जताए जाने से संबंधित एक बयान से दिल्ली का कुछ ज़ायका बिगड़ा था और शायद उसी का परिणाम था कि मनमोहन सिंह स्वयं सोमवार को पालम हवाई अड्डे पर राष्ट्रपति जिंताओ की अगवानी के लिए मौजूद नहीं थे.

लेकिन मंगलवार को द्विपक्षीय मुलाकातों के दौर में इस विवाद का साया कहीं नहीं दिखा.

ऐसा नहीं था कि विवादास्पद मुद्दों पर चर्चा नहीं हुई या दोनों ही राष्ट्र उनके हल के कहीं भी नजदीक ही पहुँचे लेकिन कोशिश आज की बैठक में यही रही कि सीमा संबंधी पेंचीदा विवादों का तेज़ी से हल निकालने की कोशिश हो.

सीमा विवाद पर दोनों ही नेताओं ने एक जैसे विचार ही व्यक्त किए कि इनका समाधान तेजी से निकाला जाए.

लेकिन चीन-भारत संबंधों की बुनियाद अब जितनी सामरिक और कूटनीतिक है उतनी ही आर्थिक भी. पिछले कुछ ही वर्षों में दोनों देशों के बीच व्यापार लगभग सौ गुना बढ़कर 20 अरब डॉलर हो गया है. जिंताओ के मुताबिक 2010 का लक्ष्य है इस आँकड़े को भी दोगुना कर देना.

मामला चाहे कृषि का हो या विज्ञान का या फिर परमाणु ऊर्जा का या कोलकाता और गुआंजाओ में नए दूतावास खोलने का हर मोर्चे पर भारत और चीन एक-दूसरे के साथ काम करना चाहते हैं.

अपनी पत्नी के साथ जिंताओ
क्या रिश्तों का नया दौर शुरु हो पाएगा

मंगलवार की मुलाकात में यह भी तय हुआ कि दोनों देशों के बीच नियमित शिखर वार्त्ताएँ हो और भारतीय और चीनी विदेश मंत्री के मध्य एक हॉटलाइन भी स्थापित हो.

इन सब कर्णप्रिय घोषणाओं और समझौतों का यह मतलब कतई नहीं है कि चीन और भारत के संबंधों में अब शंकाओं और विवादों का स्थान ही नहीं रहा.

सीमा विवाद हो, चीन की कश्मीर नीति हो, और इस्लामाबाद से दोस्ती हो या फिर भारत-अमरीका संबंधों की बढ़ती प्रगाढ़ता यह सब कुछ अब भी बदस्तूर क़ायम है.

फ़र्क सिर्फ यह है कि दुनिया के दो सबसे तेजी से बढ़ती हुई अर्थव्यवस्थाओं और भविष्य की महाशक्तियों को कहीं यह अहसास हो गया है कि साथ चलने में ही दोनों का लाभ है.

शायद इसीलिए दोनों ही पक्ष यह बात लगातार दोहरा रहे हैं कि चीन-भारत सब के आयाम अब केवल द्विपक्षीय नहीं हैं.

भारत-चीन संबंधों का असर अब न सिर्फ पूरे क्षेत्र बल्कि संपूर्ण विश्व पर पड़ता है.

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