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ज़िंदगी में रातोरात लग गए पहिए | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
पश्चिम बंगाल के हुगली जिले का यह अनाम-सा कस्बा टाटा समूह की छोटी कार परियोजना और उसके विरोध के कारण अचानक सुर्खियों में आ गया है. लेकिन इससे अनेक किसानों को कोई परेशानी नहीं है जिनको इस सप्ताह अपनी जमीन के बदले राज्य सरकार से लाखों रुपए के चेक मिले हैं. उनके लिए इस पैसे को सहेजना भी कोई आसान काम नहीं है. अनंत पाखिरा, विप्लव चंद्र और राधिका मंडल जैसे सैकड़ों लोगों ने अब तक यह सोचा भी नहीं है कि वे आखिर इस पैसे का क्या करें? अब तक गांव के किसी व्यक्ति का बैंक में खाता भी नहीं था. लेकिन अब खाता खुलवाने की होड़ लग गई है. यही नहीं, लोगों को इस रकम के निवेश की मुफ्त सलाह देने वाले कुछ कमीशन एजेंट भी यहाँ सक्रिय हो गए हैं. अब तक यहां सिर्फ इलाहाबाद बैंक की एक शाखा थी लेकिन अब दूसरे बैंक भी यहाँ आने की तैयारी कर रहे हैं.
अनंत कहते हैं, "मेरे पास सरकार को जमीन देने के अलावा कोई विकल्प नहीं था. इसके अलावा कीमत अच्छी मिल रही है और घर से एक व्यक्ति को टाटा मोटर्स कारखाने में नौकरी देने का भी प्रस्ताव है." वे कहते हैं, "अब तक बैंक में मेरा खाता नहीं था. इतने पैसे ही नहीं थे कि बैंक में रखने की नौबत आती. लेकिन अब मैंने भी खाता खोल लिया है." वे इन पैसों से एक दुकान खोलने की योजना बना रहे हैं. रातोंरात इलाहाबाद बैंक की सिंगुर शाखा के प्रबंधक विप्लव बसु कहते हैं कि "लोगों को अचानक बहुत पैसे मिल गए हैं. इन पैसों और टाटा की परियोजना को ध्यान में रखते हुए कुछ कार और इलेक्ट्रानिक कंपनियां भी इलाके में शो रूम खोलने की योजना बना रही हैं."
आखिर रातोंरात इलाके के लोग अमीर जो हो गए हैं. इलाके में लगभग चार हजार लोगों की जमीन का अधिग्रहण किया जा रहा है. टाटा समूह को एक हजार एकड़ जमीन दी जानी है. वे कहते हैं कि "इस परियोजना के बाद इलाके का तेजी से विकास होगा. अब तक अनाम रहा यह कस्बा जल्दी ही प्रमुख औद्योगिक केंद्र के तौर पर उभरेगा." लेकिन यहां जमीन के बदले मिलने वाले पैसे को साथ कुछ सामाजिक बुराइयों के आने का भी अंदेशा है. इलाके के चयन विश्वास कहते हैं कि "अचानक मिली समृद्धि से नुकसान का अंदेशा ही ज्यादा है. लोग इस पैसे को कार और दूसरे उपभोक्ता सामानों पर खर्च कर सकते हैं. इलाक़े में कई शानदार होटल भी बनने वाले हैं."
टाटा के अलावा अभी इंडोनेशिया के सलेम समूह की विभिन्न परियोजनाओं के भी हजारों एकड़ जमीन का अधिग्रहण किया जाना है. इसलिए सरकार तय समय पर टाटा को जमीन सौंपना चाहती है. राज्य के वाणिज्य और उद्योग सचिव सव्यसाची सेन कहते हैं कि "दुर्गापूजा के बाद जमीन सौंप दी जाएगी." पर्यवेक्षक कहते हैं कि तृणमूल नेता ममता बनर्जी के पास अपने कमजोर होते संगठन में जान फूंकने के लिए एक मुद्दे की तलाश थी. अब वे जमीन के सहारे अपनी राजनीति चमकाने में जुट गई हैं. कांग्रेस के समर्थन से उनका उत्साह और बढ़ गया है. लेकिन क्या सिंगुर के लोग उनके साथ हैं? इस सवाल का जवाब उतना आसान नहीं है. तृणमूल के ही एक नेता कहते हैं कि "कुछ किसान हमारे साथ हैं. अब किसी मुद्दे पर आम राय बनाना तो मुश्किल है. लेकिन पार्टी किसानों के हक की लड़ाई जारी रखेगी." ममता ने इस मुद्दे पर नौ अक्तूबर को बंगाल बंद भी बुलाया है. उनको अपने इस आंदोलन में कितनी कामयाबी मिलेगी, यह तो बाद में पता चलेगा. लेकिन इतना तो स्पष्ट है कि सिंगुर के लोग एक बहुत ही गहरे उहापोह से गुज़र रहे हैं अचानक आने वाली समृद्धि का उनके जीवन पर कैसा असर पड़ेगा यह आने वाले दिनों में सामाजिक अध्ययन का एक दिलचस्प विषय होगा. | इससे जुड़ी ख़बरें अधिकारों की लड़ाई या राजनीति19 सितंबर, 2006 | भारत और पड़ोस किसानों को लूटा जा रहा है: वीपी सिंह22 अगस्त, 2006 | भारत और पड़ोस टिहरी बांध से बिजली उत्पादन शुरु17 जुलाई, 2006 | भारत और पड़ोस सुप्रीम कोर्ट ने पुनर्वास के मुद्दे पर चेताया17 अप्रैल, 2006 | भारत और पड़ोस 'पुनर्वास और निर्माण साथ-साथ हों'17 अप्रैल, 2006 | भारत और पड़ोस 'डब्ल्यूटीओ में भारत का रूख़ ग़लत'19 दिसंबर, 2005 | भारत और पड़ोस जंगल पर हक़ जताने का संघर्ष05 फ़रवरी, 2006 | भारत और पड़ोस विनिवेश को लेकर गतिरोध बरक़रार01 जुलाई, 2005 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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