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मंगलवार, 19 सितंबर, 2006 को 11:00 GMT तक के समाचार
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अधिकारों की लड़ाई या राजनीति

किसान
सात गाँवों के लोग इस परियोजना के लिए ज़मीन दिए जाने से प्रभावित हो रहे हैं
दिल्ली से लगभग 40 किलोमीटर दूर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के दादरी शहर से लगा बझेड़ा खुर्द गाँव इस समय पुलिस छावनी में तब्दील होता दिख रहा है.

रविवार को यहाँ लगभग आसपास के गाँवों के 250 लोगों और पुलिस के बीच झड़पें हुईं जिसके बाद यहाँ तनाव फैल गया है.

यहाँ किसान अपने परिवार सहित धरने पर बैठे हुए हैं जिनकी ज़मीन का अधिकार राज्य सरकार ने रिलायंस समूह को उनकी एक परियोजना के लिए दे दिया है.

हालांकि कुछ लोगों का मानना है कि उन्हें अपनी ज़मीन का उचित मुआवज़ा नहीं मिला है लेकिन
इनमें से कुछ किसान ऐसे भी हैं जो अपनी ज़मीन को खोना नहीं चाहते हैं.

80 वर्षीय मीर सिंह कहते हैं, "बिजली परियोजना के लिए उनकी उपजाऊ ज़मीन ही क्यों ली जा रही है जबकि वहाँ बंजर ज़मीन भी है. मुआवज़ा ज़बरदस्ती थोपा जा रहा है."

वो कहते हैं, "बरसों से हमारे बाप-दादा इस ज़मीन पर खेती करते आ रहे हैं. अन्न उपजाते आ रहे हैं. ज़मीन बेचना कितनी शर्म की बात है और नासमझी भी. हमारी खोदी-बनाई ज़मीन बिजली के लिए इस्तेमाल करना. इसके लिए तो कोई और ज़मीन लेनी चाहिए."

ज़मीन की लड़ाई

ज़मीन खोने का ग़म सिर्फ़ बुज़ुर्गों को ही नहीं है. मीर सिंह के युवा पुत्र 35 वर्ष के हैं और वो ग्रेजुएट भी हैं लेकिन फिर भी वो खेती ही करना चाहते है.

 भूमि अधिग्रहण क़ानून के तहत मुआवज़ा तय किया गया है और लोग अपना मुआवज़ा ले चुके हैं. उनकी ज़मीन का बेनामा हो चुका है और किसानों का नाम हटाकर सरकार के ऊर्जा विभाग का नाम दर्ज हो चुका है. क़ानूनी तौर पर अब इन लोगों का कोई दावा यहाँ नहीं बनता
शशांक चौहान, एसडीएम, हापुड़

इस आंदोलन में गाँव की महिलाएँ भी खुलकर सामने आ रही है. एक महिला के मुताबिक़ रविवार को हुई झड़प में पुलिस ने उन्हें बहुत मारा लेकिन वो पीछे नहीं हटने वाली.

वो बताती हैं, "उन लोगों ने हमें बहुत मारा. लेकिन यह हमारी ज़मीन का सवाल है. हम अपना खेत छोड़कर क्यों जाएँ. हमें तो कफ़न बाँध कर चलना है और हम मरेंगे भी यही और मरने के बाद दफ़्न भी यहीं होंगे."

उधर स्थानीय प्रशासन का कहना है कि 99 फ़ीसदी लोग अपना मुआवज़ा ले चुके हैं और अब उनका इस ज़मीन पर कोई क़ानूनी दावा नहीं है.

हापुड़ ज़िले के सब-डिविज़नल मजिस्ट्रेट शशांक चौहान ने बीबीसी को बताया, "भूमि अधिग्रहण क़ानून के तहत मुआवज़ा तय किया गया है और लोग अपना मुआवज़ा ले चुके हैं. उनकी ज़मीन का बेनामा हो चुका है और किसानों का नाम हटाकर सरकार के ऊर्जा विभाग का नाम दर्ज हो चुका है. क़ानूनी तौर पर अब इन लोगों का कोई दावा यहाँ नहीं बनता."

सवाल या स्वार्थ

सरकार और राजनेता आर्थिक विकास की दुहाई दे रहे हैं और इस विरोध के पीछे प्रतिद्वंदी राजनीतिक ताकतों का हाथ बताते हैं. यहाँ सवाल सिर्फ़ मुआवज़े और ज़मीन का ही नहीं लगता.

किसान महिला
पुलिस के लाठीचार्ज के निशान दिखाती एक महिला

सरकार आठ फ़ीसदी की आर्थिक विकास दर पाने और पूँजी निवेश आकर्षित करने के लिए विशेष आर्थिक क्षेत्र (एसईज़ेड)बना रही है. इनके पीछे धारणा यह है कि यहाँ अंतरराष्ट्रीय स्तर की सुविधाएँ मुहैया कराई जा सकें और निर्यात को बढ़ावा मिल सके.

देश के कई हिस्सों में तो सरकार ने ऐसे 42 एसईज़ेड बनाने की मंज़ूरी दे दी है जिसमें गाज़ियाबाद और नोएडा भी शामिल हैं.

इसके लिए सरकार हज़ारों एकड़ ज़मीन दे रही है जिसकी वहज़ से लोखों किसान विस्थापित हो रहे हैं.

दूसरी तरफ़ किसान यह भी सवाल कर रहे हैं कि विकास के लिए यह क़ीमत क्या वाजिब है? क्या विकास के लिए और विकल्प हैं? क्या राजनीतिक नेता व्यक्तिगत स्वार्थों के लिए ये विकल्प ढूँढ रहे हैं?

ये बहस बझेड़ा खुर्द में ही नहीं बल्कि पूरे देश में छिड़ी हुई है.

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