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किसानों को लूटा जा रहा है: वीपी सिंह | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
मेरा कहना है कि रिलायंस की बिजली परियोजना के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाना कोई उद्योग बनाम किसानों की लड़ाई नहीं है. इसे ग़लत तरीके से पेश किया जा रहा है. उदारीकरण का सिद्धांत है कि ख़रीददार और बेचनेवाले अपने आप फ़ैसला करें. इसमें सरकार की भूमिका कम से कम हो. किसानों का अधिकार है कि वो अपनी ज़मीन को उचित कीमत पर बेचें. लेकिन कारोबार जगत ने किसानों को निशाना बनाया हुआ है. मेरा सवाल है कि वे ऊसर ज़मीन पर क्यों नहीं उद्योग लगाते, वे सबसे उपजाऊ ज़मीन को ही क्यों ख़रीदना चाहते हैं. सरकार ज़मीन का अधिग्रहण करती है. जैसे दादरी में 150 रुपए गज पर किसानों की ज़मीन को ख़रीदा गया और खेतिहर ज़मीन को औद्योगिक कामों में लगाने की मंज़ूरी दी गई और इसका बाज़ार भाव 5700 रुपए हो गया. इस ज़मीन में एक पत्थर भी नहीं लगा तो फिर क्यों इसकी कीमत इतनी हो गई. मैं पूछना चाहता हूँ कि अगर यह असली कीमत है तो फिर किसानों को इतनी कम कीमत क्यों दी जा रही है. जब इस संयंत्र से बिजली तैयार होगी तो उसकी क़ीमत बाज़ार के हिसाब से तय होगी, लोहा गिट्टी सब बाज़ार की क़ीमत से ख़रीदा जाएगा तो फिर किसान को क्यों नहीं बाज़ार की कीमत मिलनी चाहिए. हमारा सवाल राजनीतिक नहीं है, आर्थिक है और हमें इसका जवाब नहीं मिल रहा है. (आशुतोष चतुर्वेदी से बातचीत पर आधारित) | इससे जुड़ी ख़बरें वीपी किसानों के लिए गिरफ़्तार हुए17 अगस्त, 2006 | भारत और पड़ोस उत्तर प्रदेश में बढ़ता राजनीतिक टकराव16 अगस्त, 2006 | भारत और पड़ोस वीपी ने फिर बनाया जनमोर्चा23 अप्रैल, 2006 | भारत और पड़ोस अहम है तीसरे मोर्चे की भूमिका01 अक्तूबर, 2005 | भारत और पड़ोस पिछड़ों के लिए सत्ता का रास्ता खुला08 सितंबर, 2005 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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