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अहम है तीसरे मोर्चे की भूमिका | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
ज़मीनी स्तर पर तीसरे मोर्चे की हमेशा संभावना रही है. काफ़ी वोटर है जो एक नई धारा चाहते हैं. जब उड़ीसा में जनता दल का अधिवेशन हुआ था तब हमने कहा था कि हम कांग्रेस को मिटाना नहीं चाहते हैं क्योंकि राजनीति के दो पक्ष हैं-एक सत्ता पक्ष और दूसरा विपक्ष. विपक्ष में यदि धर्मनिरपेक्ष दल नहीं रहेगा तो सांप्रदायिक दल को स्थान मिलेगा. राजनीति में एक समय आता है जब विपक्ष ही सत्ता पक्ष का स्थान लेता है. हम चाहते हैं कि सत्तापक्ष तो धर्मनिरपेक्ष हो, साथ ही साथ विपक्ष भी धर्मनिरपेक्ष हो. यदि विकल्पों पर ध्यान नहीं दिया गया तो सांप्रदायिक ताकतें इस स्थान पर कब्ज़ा कर लेंगी. मेरा मॉडल था कि जनता दल भी मज़बूत रहे और कांग्रेस भी मज़बूत रहे. जब मैंने यह बात जनता दल के अधिवेशन में कहीं तो कई समाजवादियों को यह पसंद नहीं आई क्योंकि उन्हें कांग्रेस से एलर्जी रहती है. मेरा मानना था कि कांग्रेस ग़ायब हो जाए,यह देश के लिए अच्छा नहीं है. दोनों पक्ष-सत्ता पक्ष और विपक्ष धर्मनिरपेक्ष होने चाहिए. सैद्धांतिक और व्यावहारिक दोनों रूप से यह ज़रूरी है. अन्यथा आप सांप्रदायिक शाक्तियों को स्थान देते रहेंगे. इसके उदाहरण सबके सामने हैं. मध्य प्रदेश हो,राजस्थान या फिर गुजरात में विकल्प नहीं था और वे वहाँ सत्ता में हैं. जहाँ जनता को विकल्प मिल गया वहाँ वे सत्ता में नहीं आ पाए. सैद्धांतिक रूप से भले ही मैं तीसरे मोर्चे के पक्ष में हूँ. लेकिन मेरा मानना है कि बहुत अर्से बाद यूपीए बना है. भले ही तीसरा मोर्चा गठित करना संभव हो लेकिन फिलहाल व्यावहारिक रूप में इसकी ज़रूरत नहीं है. मेरा मानना है कि यूपीए अगर किसी वजह से अस्थिर हुआ तो भारतीय जनता पार्टी बड़ी ताकत के साथ सत्ता में आएगी. इसलिए हम चाहते हैं कि यूपीए सरकार पूरे पाँच साल चले. (आशुतोष चतुर्वेदी से बातचीत पर आधारित) |
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