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'लक्ष्य सही, पर तेज़ी दिखाने की ज़रूरत'

मनमोहन सिंह और सोनिया गाँधी
भारत और पाकिस्तान के संबंधों को सुधारने में सरकार ने अहम भूमिका अदा की
मेरा मानना है कि एक वर्ष के अंदर जो लक्ष्य रखे गए वे सही थे. आम लोगों की समस्याओं और किसानों की समस्याओं का ध्यान रखा गया था.

देश के व्यापक हित को देखते हुए पाकिस्तान के साथ संबंधों को बढ़ाने का सिलसिला चल रहा है.

उसके साथ ही आर्थिक क्षेत्र में बातचीत को पाकिस्तान द्वारा स्वीकारा किया जाना काफी महत्वपूर्ण रहा है.

दूसरी ओर सिक्किम को चीन द्वारा स्वीकार किया जाना और सीमा समझौतों पर हस्ताक्षर होना ये दोनों ही इस सरकार की उपलब्धियाँ हैं.

सूचना के अधिकार विधेयक को संसद ने पास कर दिया.

रोज़गार गारंटी योजना में विलंब ज़रूर हुआ है क्योंकि जो समिति बनी थी उसकी बैठक ही नहीं हुई है और वह जिस स्वरूप में हैं, उसमें अभी सुधार की ज़रूरत है.

इसमें सामाजिक नियंत्रण बहुत कमज़ोर हैं. ग्राम सभाएं, ग्राम पंचायतों का दख़ल होना चाहिए.

हालाँकि सूचना के अधिकार मिल जाने से काफ़ी कुछ किया जा सकता है. लेकिन इन सब खामियों को दूर किया जाना चाहिए.

ऐसे कई मसले हैं जो सरकार पूरा नहीं कर पाई. सबसे बड़ा मसला था झुग्गी झोपड़ी में रहने वालों के लिए रोटी,कपड़ा और मकान. ये तीनों ही मौलिक ज़रूरत हैं.

न्यूनतम साझा कार्यक्रम में भी यह कहा गया है कि अनावश्यक रूप से इन्हें नहीं हटाया जाएगा.

समन्वय की ज़रूरत

लोकपाल विधेयक और महिला आरक्षण विधेयक नहीं आ पाया है.

मेरा मानना है कि महिला आरक्षण के मामले में थोड़ा राजनीतिक समन्वय करना होगा.

मुझे उम्मीद है क्योंकि प्रधानमंत्री कार्यालय खुद हर मंत्रालय का आकलन कर रहा है. इसका प्रभाव पड़ेगा क्योंकि मैं ख़ुद अपने कार्यकाल के दौरान ऐसा करता था.

हर महीने की पहली तारीख़ को मंत्री को यह बताना होता था कि उसके हिस्से की घोषणा पर कितना अमल हुआ. और एक निश्चित तारीख़ दी जाती थी जैसा प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह कर रहे हैं.

मेरा मानना है कि प्रधानमंत्री खुद इसमें रूचि ले रहे हैं तो कार्य काफी तेज़ी से होगा.

सरकार को पहले साल में काफ़ी कुछ करना होता है क्योंकि सब कुछ व्यवस्थित होता नहीं है और गठबंधन की सरकार में बहुत कुछ सलाह करनी होती है.

मेरा मानना है कि विपक्ष को यदाकदा ज़रूरत होने पर संसद से बाहर आना चाहिए.

लेकिन वे तो हमेशा बाहर आ जाते हैं, किसी भी चीज़ की अति नहीं होनी चाहिए.

बजट बिना विपक्ष के बहस के ही पास हो जाए, यह तो अच्छी बात नहीं है. विपक्ष का कर्त्तव्य है कि जब बजट पर बहस चल रही है तो वे जनता के मुद्दे रखते.

जहाँ तक सरकार के कार्यकाल पूरा करने का प्रश्न है तो कांग्रेस अगर वामपंथियों का ध्यान रखती है, तो सरकार चलेगी.

और अगर किसी एक बड़े घटक को नहीं संभाल पाई तो समस्या उत्पन्न हो जाएगी.

(आशुतोष चतुर्वेदी से बातचीत पर आधारित)

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