|
पिछड़ों के लिए सत्ता का रास्ता खुला | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
मंडल आयोग की सिफ़ारिशें लागू करने के पीछे कारण कितने राजनीतिक थे और कितने सामाजिक इसे लेकर तो बहुत दिनों तक बहस हो चुकी है. सुप्रीम कोर्ट में भी बहस हुई और सुप्रीम कोर्ट ने बात बहुत ठीक पकड़ी. जाति व्यवस्था के आधार पर हमारे समाज के बहुतायत लोगों को वंचित किया गया. सुप्रीम कोर्ट ने फ़ैसला किया जिसमें सवर्ण न्यायाधीश थे कि अगर सज़ा जन्म और जाति के आधार पर मिली है तो दवा उसी आधार पर देनी होगी. इस तरह से देखें तो मंडल आयोग की सिफ़ारिशों को लागू करना हज़ारों साल से जो अन्याय हुआ है, उसका, एक तरह से प्रायश्चित है. अब मंडल के बाद जो राजनीतिक परिवर्तन आया है उसके पंचायत से संसद तक जो सामाजिक संरचना है वह बदल गई है. सिविल वार की चिंता कहा जाता रहा है कि इससे समाज में एक विभाजन हो गया लेकिन मैं इसे नहीं मानता. जो विभाजन था वह तो पहले से ही समाज में था, यह क्या मंडल से हुआ है? अब मायावती ब्राह्मणों को इकट्ठा कर रही हैं, मुलायम सिंह ऊँची जाति के लोगों को इकट्ठा करने में लगे हुए हैं. मंडल के आने से ये ज़रुर हुआ है कि जो पॉवर बैलेंस था यानी जो शक्ति संतुलन था, वह बदल गया. सत्ता में जो वंचित वर्ग था, जो दलित, पिछड़े थे, उनकी भागीदारी पहले सत्ता में नहीं होती थी और अब इन लोगों की हिस्सेदारी बढ़ी है, लेकिन इसको लेकर कहीं भी टकराव नहीं हुआ. लोग आशंका जताते थे कि सिविल वार हो जाएगा, लेकिन आज 15 साल हो गए, कहाँ हुआ सिविल वार. और दक्षिण में तो पिछड़ों के लिए आरक्षण तो अंग्रेजों के जमाने से लगा हुआ है, कहाँ हुआ दक्षिण भारत में कोई सिविल वार? अब तो हर राजनीतिक पार्टी इसको स्वीकार करती है. कोई प्रधानमंत्री लालकिले पर भाषण करने जाता है तो बिना सामाजिक न्याय की बात के उतरता नहीं है. अभी सुप्रीम कोर्ट ने फ़ैसला दिया कि व्यावसायिक शिक्षा देने वाले ऐसे संस्थानों में आरक्षण नहीं होगा जो सरकारी सहायता नहीं लेते. तो अब सारी पार्टियाँ इकट्ठा होकर कह रही हैं कि आरक्षण होना चाहिए. तो अब हमें बहस करने की ज़रूरत नहीं हैं लोग ख़ुद ही बहस कर रहे हैं आरक्षण के पक्ष में. वंचित वर्ग मंडल कोई जातिगत चीज़ नहीं थी.
अवधारणा यह थी कि जितने भी वंचित लोग हों, जातियों के रेखाओं को पार करके इकट्ठा किया जाए. जातियों को नहीं जमातों को इकट्ठा किया जाए. दलित वंचित है, पिछड़ा वंचित है, अल्पसंख्यक वंचित है और उच्च वर्ग के जो ग़रीब हैं वे भी वंचित हैं, इनको इकट्ठा करके उनको स्थान दिया जाए और जोड़ा जाए. उच्च वर्ग के ग़रीब को देने का मुद्दा अगर किसी ने उठाया आज़ादी के बाद तो जनता दल पहली पार्टी है जिसने न केवल यह मुद्दा उठाया नहीं बल्कि उसे अपने चुनावी घोषणा पत्र में भी रखा. इसका दृष्टिकोण यह नहीं था कि जाति की राजनीति की जाए, हम चाहते थे कि उच्च जातियों से भी वंचित लोगों को इकट्ठा किया जाए. दुर्भाग्य है उस जो पहले का लक्ष्य था उससे हटकर अब जाति के आधार पर ही बात होने लगी है. चुनावी राजनीति के चलते यह सब हो गया इसका दुर्भाग्य है. बजाय आंदोलन में सबको जोड़ने के यह सब हो गया. राजनीति मंडल की सिफ़ारिशें लागू करने के पीछे राजनीति की चर्चा की जाती है. लेकिन ऐसा कुछ नहीं है. यह तो हमारे चुनावी घोषणा पत्र में था कि सरकार बनी तब मंडल लागू करेंगे. अपना जो एक्शन प्लान था सरकार का, पार्टी का नहीं, उसको अखबारों में प्रकाशित किया गया कि एक कमेटी बनाएँगे, कमेटी बना दी गई. चौधरी देवीलाल उस कमेटी के अध्यक्ष बनाए गए, उन्होंने कुछ नहीं किया तो बाद में रामविलास पासवान को कहा कि वे ज़िम्मेदारी संभालें. पहले मंडल को लागू करने के लिए मार्च 90 की तारीख़ तय थी. जब चौधरी साहब ने कोई पहल नहीं की तब जुलाई 90 की तारीख़ तय की गई. तब तक मंडल कोई मुद्दा ही नहीं था. जो चीज़ गरीबों के लिए होती है, यह तो इतिहास का क्रम है कि पहले उसकी हँसी उड़ाई जाती है, फिर उसकी नीयत को बुरा कहा जाता है. लेकिन फिर भी हमनें एक राजनीतिक सहमति बनाई और इसे लागू किया. यह कोई मुद्दा नहीं कि कितने वर्ष बाद कौन हमें याद करेगा लेकिन इतना जानते हैं कि 11 महीना हमें सत्ता मिली और इसमें हमने पिछड़ा वर्ग के लिए सत्ता के दरवाज़े पुश्त-दर पुश्त के लिए खोल दिए. 15 साल में यह साबित हो गया है कि जो भी पार्टी इसका विरोध भी करती थी, जब सत्ता में आई तो इसको मिटा नहीं सकी. अब इसको कोई नहीं उलट सकता. (जैसा उन्होंने आशुतोष चतुर्वेदी को बताया) |
| ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||