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मंगलवार, 02 अगस्त, 2005 को 12:27 GMT तक के समाचार
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विनिवेश में सावधानी की ज़रूरत

वीपी सिंह
वीपी सिंह का मानना है कि उदारीकरण में सावधानी बरतने की ज़रूरत
मैं उदारीकरण के मामले में मध्यमार्गी हूँ. हमें उदारीकरण की ज़रूरत है और हमने इसको शुरू भी किया था.

लेकिन मेरा मानना है कि हमें इतना बड़ा साफा बाँधना चाहिए जिससे आँख-कान खुला रहे. इसी तरह उतना ही उदारीकरण होना चाहिए जितनी देश को ज़रूरत है.

दरअसल स्वतंत्रता के बाद देश के निजी क्षेत्र की इतनी क्षमता नहीं थी कि वह देश की बुनियादी ज़रूरतों को पूरा कर सके.

प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने सार्वजनिक क्षेत्र की नींव रखी. सार्वजनिक क्षेत्र उस समय देश की ज़रूरतों से पैदा हुआ था.

लेकिन उसके बाद विदेशी मुद्रा की कमी हुई फिर विदेशी सामानों पर प्रतिबंध लगा.

उससे जो माँग पैदा हुई, उससे भारतीय उद्योगों का विस्तार हुआ.

कुछ लोग कहते हैं कि यह फ़ैसला ग़लत था. मेरा कहना है कि पाँच साल पहले किसी बालक के जो कपड़ा बनता था, उसको 12 साल बाद यह कहना कि वह ठीक आकार का नहीं था, यह उचित नहीं है.

लेकिन मैं यह मानता हूँ कि इससे प्रतिस्पर्धा नहीं रही बल्कि एकाधिकार पैदा हुआ.

इसकी वजह से गुणवत्ता और लागत दोनों में आंतरिक प्रतिस्पर्धा नहीं रही.

जिसको लाइसेंस मिल गया, उसकी स्थिति ऐसी हो गई कि स्टेडियम में अकेला आदमी दौड़ रहा है और जाहिर है वही विजेता होगा.

रूस ही ऐसा एक देश था जो हमसे सामान ख़रीदता था. हमारी और उनकी क्वालिटी एक दूसरे के लिए बनी थी.

लेकिन हमारा उदारीकरण का मॉडल दूसरा था. पहले पहले आंतरिक प्रतिस्पर्धा पैदा करो, उसके बाद बाज़ार खोलो.

हमारा मानना था कि उद्योगों पर चाबुक लगाओ लेकिन उनको डंडा मत मारो. उनके लिए पहले खिड़की लगा दो फिर बाहर का दरवाज़ा खोलो.

विनिवेश

लेकिन विनिवेश के मामले में मेरा मानना है कि मुनाफ़ा कमानेवाली सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों चाहे वह बीएचईएल हो उनका विनिवेश नहीं किया जाना चाहिए.

हमारा मानना है कि जब एक सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी मुनाफ़ा कमा रही है और प्रतिस्पर्धा का सामना करने की उसमें शक्ति है तो उसे क्यों निशाना बनाया जाए.

उस कंपनी का ज़बरदस्ती गला दबाने की क्या ज़रूरत है. दरअसल जो लोग सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों को ख़रीदते हैं, उनकी निगाह ज़मीन पर रहती है.

दूसरी ओर सरकार की नीति है कि विनिवेश में ज़मीन की कीमत नहीं लगाई जाती. ऐसे मामले सामने आए हैं कि बाद में ज़मीन बेच दी गई.

अगर आप मुफ़्त में ज़मीन देना चाहते हैं तो उसे लीज़ पर दीजिए. अगर कंपनी नहीं चलाई जाती है तो ज़मीन वापस ली जानी चाहिए.

इस प्रक्रिया को अदालत में चुनौती देने की ज़रूरत है.

(आशुतोष चतुर्वेदी से बातचीत पर आधारित)

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