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'संघर्ष का नाम ही ज़िंदगी है' | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
मेरा स्वास्थ्य ठीक है. ज़िंदगी पूरी हो गई लगती है. अब मैं एक दिन ज़िंदगी की लड़ाई लड़ता हूँ और एक दिन जनता के लिए लड़ता हूँ. यह काफ़ी अर्से से चल रहा है. लेकिन जो बीमारियाँ हैं, उनकी दवा नहीं है. मैं मानता हूँ कि जनता की दुआ से सब काम चल रहा है. मेरी एक तो किडनी ने काम करना बंद कर दिया है. दूसरा मुझे मल्टीपल मायलोमा है जो एक प्रकार का कैंसर है. पिछले साल इसकी कीमोथैरिपी भी हुई. इसका कोई इलाज नहीं है. किडनी ट्रांसप्लांट की बात भी हुई लेकिन डॉक्टरों ने मना कर दिया. हालांकि हज़ारों लोगों ने अपनी किडनी देने की पेशकश की थी. अब हफ़्ते में तीन दिन डायलिसिस होता है. इस प्रक्रिया में पूरा दिन निकल जाता है. बीच में मैं गुरिल्ला वारफेयर करता हूँ. हम जानते हैं कि बहुत दिन नहीं हैं. व्यावहारिक बात भी है कि संभावनाएँ कम हैं. दिन कम बचे हैं और इन बचे हुए दिनों में मुँह लटका के बैठ जाएँ तो जो बचा है वह भी गया. यानी बाक़ी के दिन अपने व्यवहार से गवां दें, यह मुझे स्वीकार नहीं है. जनता के लिए संघर्ष के अलावा मैं अपना समय पेंटिंग में भी लगाता हूँ. सबसे बड़ी बात है कि जिस बात में परिवर्तन नहीं हो सकता, उसे स्वीकार कर लेना चाहिए. लेकिन ऐसा भी नहीं कि उससे मैं कम लड़ता हूँ या फिर उससे हार मान ली हो और लापरवाही बरतता हूँ. मानसिक रूप से जब दुख नहीं रह गया तो फिर कैसी बीमारी. इसकी गति हम जानते हैं. जब तक हैं तब तक हैं. जब आएगा तो देखेंगे. इस उम्र में तो बोरिया बिस्तर बाँधे रहना चाहिए. (आशुतोष चतुर्वेदी से बातचीत पर आधारित) |
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