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'वीपी सिंह पर लोगों को भरोसा था'

विश्वनाथ प्रताप सिंह
विश्वनाथ प्रताप सिंह भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ बग़ावत कर 1989 में प्रधानमंत्री बने थे
चाहे वो बोफ़ोर्स तोप का मसला हो या फिर पनडुब्बी का, विश्वनाथ प्रताप सिंह ने देश में एक नया वातावरण पैदा कर दिया था.

दो चीज़ें थीं, एक तो लोगों का राजीव गाँधी पर विश्वास कम हो गया था और दूसरी ओर इतना ही, या इससे ज़्यादा विश्वनाथ प्रताप सिंह पर भरोसा हो गया था.

मैंने हिंदुस्तान के इतिहास में कांग्रेस के बाहर किसी को नहीं देखा जो इतनी तेज़ी से उभरा, और वो ठीक भी था.

मीडिया भी विश्वनाथ प्रताप सिंह के साथ था क्योंकि मीडिया पर भी तो यह जवाबदेही होती ही है कि वह 'ईमानदारी' को 'ईमानदारी' कह रहा है या नहीं.

कहना और करना

उन्होंने पार्टी बना ली थी. जनता दल नया था और उसके पास संसाधन नहीं थे लेकिन लोग पार्टी के साथ थे.

मैंने भी उनकी पार्टी की टिकट पर पंजाब से चुनाव लड़ा था और उनके मंत्रिमंडल में भी था.

जयप्रकाश नारायण के आंदोलन के बाद दूसरी बार देश में एक बड़ा मुद्दा उछला था और लोग इसको समर्थन दे रहे थे क्योंकि दोनों में बहुत सी समानताएँ थीं.

एक तो दोनों भ्रष्टाचार का विरोध कर रहे थे और दूसरे दोनों की छवि बहुत साफ़ थी.

वे ईमानदारी के पक्षधर थे और इसमें सिर्फ़ आर्थिक ईमानदारी नहीं थी, वह तो थी ही वे जो कहते थे वही करना चाहते थे.

यूं तो पार्टियाँ घोषणा पत्र जारी करती रहती हैं लेकिन जनता दल की सरकार ने जो घोषणा पत्र जारी किया था उसकी नियमित समीक्षा होती थी.

सप्ताह में एक दिन कैबिनेट की बैठक होती थी और हर मंत्रालय को बताना होता था कि उसने घोषणा पत्र पर अमल की दिशा में क्या किया.

अपने छोटे से कार्यकाल में विश्वनाथ प्रताप सिंह ने घोषणा पत्र के हर मुद्दे पर कुछ न कुछ ज़रुर कर लिया था.

मंडल रिपोर्ट

मंडल आयोग की रिपोर्ट उनमें से एक थी.

यह कहना सही नहीं होगा कि मंडल आयोग के पीछे कोई राजनीतिक़ मक़सद था न उसे लागू करने में हड़बड़ी की गई.

लेकिन यह भी सच है कि देश में जो राजनीतिक तब्दीली आई, ख़ासकर उत्तर भारत में वह मंडल के बाद ही संभव हो सकी.

लोगों ने पहली बार पिछड़ी जातियों की बातें करनी शुरु कीं.

कहा जा सकता है कि क्षेत्रीय अस्मिता का सवाल उठाने में भी एक हद तक मंडल आयोग की भी भूमिका थी और है.

सरकार गिराने की आदत

दुर्भाग्य से जब विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार गिरी तो जनता दल में दरार आ गई थी.

कांग्रेस ने उसका फ़ायदा उठाया, जैसा कि वो हमेशा उठाती रही थी. मसलन मोरारजी की सरकार गिराने के लिए उन्होंने चरणसिंह को सहारा दे दिया था.

फिर चंद्रशेखर की सरकार के साथ वही किया जो वह करती आई थी.

आप इतिहास को देखें तो लगता है कि कांग्रेस को सरकार गिराने में महारत हासिल है.

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