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'पुनर्वास और निर्माण साथ-साथ हों' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि नर्मदा नदी पर बन रहे सरदार सरोवर बांध का काम जारी रखना चाहिए और साथ ही पुनर्वास का काम प्रभावी तरीक़े से होता रहना चाहिए. कोर्ट ने यह भी कहा कि इस मामले पर राजनीति नहीं होनी चाहिए. कोर्ट ने ये टिप्पणी इस मामले की सुनवाई के दौरान की है और इसकी सुनवाई दोपहर बाद फिर होनी है. मामले पर सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने अपना पक्ष रखते हुए बांध का कार्य जारी रखने और पुनर्वास के लिए समिति का गठन करने की प्रतिबद्धता जताई. कोर्ट ने सरकारी पक्ष सुनने के बाद कहा कि इस मामले में संतुलन बनाना ज़रुरी है क्योंकि विस्थापितों की संख्या बहुत अधिक है. मुख्य न्यायाधीश वाई के सब्बरवाल की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा " ज़रुरत इस बात की है कि इस मुद्दे को भावनात्मक रुप से न देखा जाए बल्कि सौहार्द्रपूर्ण माहौल में बातचीत से रास्ता निकाला जाए." नर्मदा बचाओ आंदोलन ने याचिका दायर कर मांग की है कि बांध की ऊंचाई 110 मीटर से बढ़ाकर 122 मीटर न की जाए. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अदालत के 2000 में दिए गए फ़ैसले के अनुरुप ही पुनर्वास किया जाएगा. पीठ का कहना था कि विस्थापन और पुनर्वास जटिल मुद्दा है जिस पर सभी को खुश नहीं किया जा सकता लेकिन पुनर्वास ठीक से होना चाहिए. अतिरिक्त सालीसिटर जनरल गोपाल सुब्रहमण्यम का कहना था कि ज़रुरत इस पूरे मसले का समाधान खोजने की है न कि समस्या को और जटिल करने की. दूसरी तरफ नर्मदा बचाओ आंदोलन का पक्ष रखने वाले एडवोकेट शांति भूषण ने कहा कि पुनर्वास का काम इलाक़ों के डूबने से 12 महीने पहले हो जाना चाहिए था. हालांकि केंद्र ने कोर्ट से कहा कि अगस्त 2006 तक पुनर्वास का काम पूरा हो जाएगा. |
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