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विनिवेश को लेकर गतिरोध बरक़रार
सीपीएम का निशान
वामपंथी दलों ने फ़ायदे में चल रहे सार्वजनिक उपक्रमों के विनिवेश पर आपत्ति जताई है.
भारत हेवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड यानी भेल के विनिवेश को लेकर केंद्र सरकार और वाम दलों के बीच गतिरोध अब भी बना हुआ है.

हालाँकि पहली बार ही सही पर विनिवेश के मुद्दे पर वामदलों के नेताओं से केंद्र की यूपीए सरकार की अध्यक्ष सोनिया गाँधी की शुक्रवार को पहली मुलाक़ात हुई और इस विषय पर चर्चा की गई.

क़रीब 45 मिनट तक चली इस बातचीत में भेल के विनिवेश पर कोई अंतिम निर्णय तो नहीं लिया जा सका पर कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी ने वामपंथी नेताओं को सुझाव दिया कि इस मसले का जल्द ही हल निकाला जाना चाहिए.

वामपंथी दल वर्तमान सरकार की विनिवेश नीति से असहमत हैं और इसी को लेकर शुक्रवार को मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव प्रकाश कारत और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव डी राजा ने सोनिया गाँधी से मुलाक़ात की.

बैठक के बाद प्रकाश कारत ने कहा कि उन्होंने इस मुद्दे पर पहली बार सोनिया गाँधी से मुलाक़ात की है.

उन्होंने कहा, "बैठक के ज़रिए हम उन्हें यह बता पाए कि क्यों हम भेल जैसे उपक्रमों के विनिवेश का विरोध कर रहे हैं और किस कारण से हम यूपीए-वाम दल समन्वय समिति का हिस्सा नहीं बनना चाहते."

उन्होंने कहा, "हमने इसी उम्मीद के साथ उनकी बातों का जवाब दिया कि चर्चा से ही इन सवालों का समाधान निकालने में मदद मिलेगी."

गतिरोध

वैसे तो केंद्र में यूपीए सरकार के गठन के बाद से ही वामपंथी दलों और सरकार के बीच कुछ न कुछ गतिरोध सामने आता रहा है.

पिछले दिनों केंद्र सरकार के भेल में अपनी हिस्सेदारी का 10 प्रतिशत शेयर बेचने के निर्णय को वामपंथी दलों ने साझा न्यूनतम कार्यक्रम का सबसे बड़ा उल्लंघन बताया है.

वामपंथी दल भारत सरकार की मुनाफ़ा कमा रही सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों में से एक भेल और अन्य नवरत्न कंपनियों के विनिवेश के सवाल को लेकर ख़ासे नाराज़ हैं.

हालांकि वामपंथी दलों को घाटे में चल रही कंपनियों के विनिवेश से कोई आपत्ति नहीं है.

भेल के विनिवेश को लेकर पिछले दिनों वामदलों ने सोनिया गाँधी को एक चिट्ठी भी लिखी थी जिसमें कहा गया था कि सरकार के इस निर्णय को देखते हुए उनका यूपीए-वामदल समन्वय समिति की बैठक में हिस्सा लेने का कोई मतलब नहीं है.

इसी के चलते वामपंथी दलों ने समन्वय समिति की बैठक में हिस्सा न लेने का निर्णय लिया था.

वामपंथी दलों का यह कदम कम्युनिस्टों के गढ़ माने जाने वाले दो राज्यों पश्चिम बंगाल और केरल के आगामी विधानसभा चुनावो के मद्देनज़र महत्वपूर्ण माना जा रहा है.

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