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शुक्रवार, 08 सितंबर, 2006 को 23:57 GMT तक के समाचार
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सत्तर बच्चों को बचाने वाले मौलवी शौकत

मौलवी शौक़त
मौलवी शौकत ने मदरसे के 70 बच्चे बचा लिए लेकिन परिवार के 24 सदस्यों को खो दिया
राजस्थान के मरूस्थल के बाड़मेर ज़िले के मलवा गांव को बाढ़ ने पूरी तरह बर्बाद कर दिया. लेकिन इस त्रासदी में मलवा के मौलवी शौकत एक नायक की तरह उभर कर सामने आए हैं.

मौलवी शौक़त ने अपनी जान की बाज़ी लगाकर मदरसे के 70 बच्चों को बचा लिया. मगर उसी समय बाढ़ ने उनके अपने परिवार के 24 सदस्यों को मौत की नींद सुला दिया.

हाल में जब पूरा देश ‘शिक्षक दिवस’ पर गुरूजनों का अभिनंदन कर रहा था तो बाढ़ से बर्बाद इस क्षेत्र के लोग मलवा मदरसे के इस शिक्षक शौकत को सलाम कर रहे थे. जल समाधि ले चुके मलवा को मौलवी शौकत निहारते हैं.

 जो अल्लाह को मंज़ूर था, वही हुआ. परिजनों की मौत मातम है तो अपने विद्यार्थी बच्चों को बचाने का संतोष भी है
मौलवी शौकत

वे कहते हैं, "जो अल्लाह को मंज़ूर था, वही हुआ. परिजनों की मौत मातम है तो अपने विद्यार्थी बच्चों को बचाने का संतोष भी है." इस पूरे इलाक़े में मौलवी शौकत की सेवा भावना के किस्से बच्चे-बच्चे की ज़ुबान पर है.

बाढ़ की विभीषिका

मौलवी शौकत उस दिन के मंज़र को याद कर कहते हैं कि उस दिन भोर में बाढ़ के पानी ने प्रलय की हुंकार भरी तो नमाज़ अदा की.

वे बताते हैं, "पानी बढ़ा तो हमने बच्चों को मकान की छत पर पहुँचाया. और वहाँ भी पानी आ गया तो मस्जिद की छत पर शरण ली. कोई 26 घंटे बाद हेलिकॉप्टर आया और लोगों को बचाया."

इस काम में मदरसे के चार अन्य शिक्षक व कुछ बड़े बच्चे भी मदद में हाथ बंटा रहे थे.

लेकिन तब तक मौलवी शौकत के परिवार के 24 लोगों को बाढ़ निगल चुकी थी.

 पानी बढ़ा तो हमने बच्चों को मकान की छत पर पहुँचाया. और वहाँ भी पानी आ गया तो मस्जिद की छत पर शरण ली. कोई 26 घंटे बाद हेलिकॉप्टर आया और लोगों को बचाया
मौलवी शौकत

मलवा के मोहम्मद यूसुफ़ रूंधे गले से कहते हैं,"मौलवी शौकत ने एक फरिश्ते का किरदार अदा किया है.पूरा गांव मौलवी शौकत के लिए दुआ कर रहा है."

मलवा पुलिस के सेवानिवृत महानिरीक्षक मुराद अली अबड़ा का भी गांव है. अबड़ा कहते हैं कि मौलवी शौकत नज़ीर बन गए हैं.

इस हादसे में मौलवी शौकत की पत्नी, दो बच्चे, माँ और परिजनों की जान चली गई. मगर वे अब भी दूसरों को ढाढस बंधाने में लगे हुए हैं.

गांव के लोग बताते हैं कि देवबंद से तालीम पा चुके मौलवी शौकत चार साल से इस मदरसे में बच्चों को पढ़ा रहे हैं. वे अपने वेतन का भी एक हिस्सा छात्रों पर ख़र्च कर देते थे.

लोगों की भावनाओं को देखते हुए लगता है कि यह दास्तान इस इलाक़े में सदियों तक याद की जाती रहेगी.

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