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सोमवार, 28 अगस्त, 2006 को 15:12 GMT तक के समाचार
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बारिश का पूर्वानुमान मुश्किल

बाढ़
इस साल भारी बारिश से गुजरात और राजस्थान में भयानक बाढ़ आई है
राजस्थान के बाड़मेर में जैसी बारिश हुई है, उसकी भविष्यवाणी काफी पहले करने में मौसम विभाग असमर्थ है.

दरअसल सीमित इलाक़े में कब भारी बारिश हो जाए, इसके बारे में कोई भी पूर्वानुमान अधिकतम तीन दिन पहले ही लगाया जा सकता है और ये भी सटीक होगा या नहीं कहना मुश्किल है.

वैसे हमारे मौसम विभाग के पास तकनीक काफी बढ़िया है और यह यूरोपीय देशों की तरह है. यूरोप में भी सीमित इलाक़े में भारी बारिश की सटीक जानकारी देने में वहाँ के वैज्ञानिक असमर्थ हैं.

इस लिहाज से किसी ख़ास ज़िले या इलाक़े के लिए इस तरह की सटीक जानकारी जुटाने के लिए हमें परीक्षण मोड्यूल को छोटा करना पड़ेगा.

अभी हम 200 वर्ग किलोमीटर के दायरे में कैसा मौसम रहेगा, इसकी जानकारी पहले से दे सकते हैं. इस दायरे को घटा कर अग़र 20 वर्ग किलोमीटर कर दिया जाए तभी बाड़मेर जैसी बारिश के बारे में पहले से बताया जा सकता है.

 पश्चिमी विक्षोभ और देश के पश्चिमोत्तर हिस्से में कम दबाव का क्षेत्र होने से राजस्थान में 15 सितंबर तक और बारिश होने से इंकार नहीं किया जा सकता.

मौसम विभाग इसकी कोशिश कर रहा है. इसके लिए छोटो इलाक़ों में अवलोकन प्रणाली (ऑब्जरवेट्री सिस्टम) लगाना होगा.

अब तो मोटे तौर पर कहा जा सकता है कि बड़े दायरे में बारिश होने का मौसम चला गया है लेकिन पश्चिमी विक्षोभ और देश के पश्चिमोत्तर हिस्से में कम दबाव का क्षेत्र होने से राजस्थान में 15 सितंबर तक और बारिश होने से इंकार नहीं किया जा सकता.

अभी हम देख रहे हैं कि मॉनसून हर साल अपना पैटर्न बदल रहा है. हर साल हम देश के किसी ख़ास इलाक़े में भारी बारिश होता देखते हैं.

इस लिहाज से बाड़मेर में हुई बारिश मौसम के मिजाज़ में किसी बड़े परिवर्तन की ओर संकेत नहीं करता है.

अगर बड़े परिदृश्य में देखा जाए तो भारत में वर्ष 1930 से 60 के बीच सबसे अधिक बारिश हुई. इसके बाद के 30 वर्षों में हुई कुल बारिश लगभग आधा प्रतिशत कमी की ओर इशारा करती है.

वैसे भी राजस्थान और सौराष्ट्र में बारिश की परिवर्तनीयता 50 प्रतिशत हो सकती है. मतलब एक ही दिन पूरे सीजन के बराबर पानी बरस सकता है.

दूसरी ओर उत्तर भारत में बारिश का पैटर्न बदलने की संभावना मात्र नौ प्रतिशत है. इस लिहाज से देखा जाए तो इस बार उत्तर भारत में बारिश औसत से 50 प्रतिशत तक कम रही और यह इलाक़ा सूखा झेल रहा है.

यह पर्यावरण के लिए ठीक नहीं है. ऐसा वर्ष 1986 में भी हुआ था जब मॉनसून दक्षिण-पश्चिम से ज़्यादा हिला नहीं.

आलोक कुमार के साथ बातचीत पर आधारित

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